Do you know ?

2009 November 27

Do you know the difference between www.google.com and www.google.in ??

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आखिरी सांस तेरे करार में

2009 November 19
by Munda Sanichari

ना देना मेरे ख़त का जवाब, काफ़िर थोड़ी देर और तू,
कैसे कहूँ के कितना मज़ा हैं कासिद के इन्तजार में …

ना दिखा चाँद सा मुखड़ा,यू घूंघट की आड़ में
मेरे नैनो में जो बसी है सूरत,बड़ी बेकरारी है उसके प्यार में

ना मिल हर पल मुझसे यूँ,कभी तो जुदा भी हो
कह उस खुदा से तेरे,के चिनवा दे मुझे किसी मेहराब में

ना छू मुझको,तेरे सुर्ख होठो की लाली से
रहने दे कुछ वक़्त और मुझे, तेरी आहो के शरार में

ना जता हर पल प्यार मुझसे,ना मोहब्बत की यूँ सदा दे
मुझे भी तड़प उस आग की,के जलूं मैं भी तेरे इनकार में

मौत मेरी जिंदगी से हसीन हो,इतना सा ख्वाब है ‘शादाब’
दम निकले आगोश में तेरे,आखिरी सांस तेरे करार में

भूख !!!

2009 November 18
by Munda Sanichari

आज फिर उसी ट्रेफिक सिग्नल पर
जहाँ पर आकर मेरी हर शाम रूकती है
कुछ दो तीन मिनट के लिए ….
और पढ़ा जाती है जाने कितने ही अनजाने पहलू

आज सब कुछ अजीब सा था
भीगा हुआ तन,कान में ईअर-फोन
मन में किसी का ख्याल…..
और तभी किसी ने आकर जैसे मुझे छुआ
नन्ही सी हथेली को आगे बढ़ा,वो बोली -
दो रूपये दे दे भाई,भूख लगी है

उसकी फाक सफ़ेद आँखें
जैसे चुनोती दे रही हो, सपनो को ठहरने की
उन बेजान आँखों में कुछ नहीं था
न कोई रंग,न कोई आस
कुछ था तो वो थी रोटी की भूख
और बारिश में और भी ज्यादा तेज होती पेट की आग

साथ में ख्याल
उस नन्हे से बच्चे का
जिसके शरीर पर कपडे की कुछ कतरने
जैसे शायद बारिश और भूख दोनों से लड़ने की
हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी

ये वही लोग है
जिनकी गाथा राजस्थान की मिटटी आज तलक गाती है
जिनकी सौगंध के किस्से
आज भी दिलो में जोश भर जाते है
जिन्होंने कसमें खायी थी,कभी न घर बनाने की
और न कभी मांग कर खाने की

आन की खातिर
जिन्होंने घास की रोटी तक खायी
वही आज चौराहों पर इज्ज़त बेच
दो जून की रोटी मांगते है

सच है, भूख इतिहास से बड़ी होती है
हर कसम से,हर वक़्त से बड़ी
हर एक एहसास और हर बलिदान से बड़ी होती है……

सर्द हवा का झोंका…..

2009 October 31
by Munda Sanichari

11सर्द हवा का झोंका आया
साथ पुरानी यादें लाया
जब तेरी गोदी में रख सर
मैं बच्चे से सोया था
तेरे हाथो में हाथ पकड़
याद तुझे मैं कितना रोया था

तेरी आँखों में भी
अश्को की माला बिखरी थी
वो बूँद मेरे चेहरे पर गिर
दिल में कितना गहरा उतरी थी

फिर उस नरम हथेली का स्पर्श
जैसे गम सारे भुला गया
मैं नींद से जागा सदियों का
आँचल में तेरे सुला गया

फिर आँख खुली, और वो वक़्त के मंजर
छीने जिसने जीवन के हर स्वर
खोया हर पल मेरा, हर वो बातें
झूटी सच्ची जाने कितनी फरियादें

पर याद तो तेरी दिल में रहती है
जब सोचूं तेरे बारे में
तो चुपके से वो यूँ कहती है
हूँ साथ तेरे मैं, तेरे अन्दर
फिर क्यों कर तुझको रोना आया
सर्द हवा का झोंका आया …..

याद आने का सबब याद नहीं आता

2009 October 26
by Munda Sanichari

कैसे कहू के तू अब या तब याद नहीं आता
याद तो आती है मगर,याद आने का सबब याद नहीं आता

किस हुनर से लूट लिया तनहा दिल को तुमने मेरे
वो चोरी तो याद है मगर,वो वक़्त याद नहीं आता

क्यों कर है इतनी मोहब्बत मुझको तुमसे
कोई राज कोई फ़साना याद नहीं आता

जब से आये हो जिंदगी में मेरे
कोई चारागर,कोई नासेह नज़र नहीं आता

क्यों कर पूछे है जमाना ‘शादाब’ तुझसे
जब वो जाने है के,तुझे कोई बहाना याद नहीं आता

उसकी आँखें सवालो जैसी

2009 October 26
by Munda Sanichari

ढूंढता हूँ हर चेहरे में,चेहरा उसका
वो ख्वाबो में भी लगे है,ख्यालो जैसी

मेरे हर लफ्ज़ समझे है,लब पे आने से पहले
फिर क्यों है उसकी आँखें सवालो जैसी

लबों ने ऐसा जादू किया काफिर तेरे
जगे में भी रहे मेरी सूरत,सोनेवालो जैसी

भूल गया ये जहां,उलझ कर जुल्फों में तेरी
खुदा न बना पाया,कडिया तेरे बालो जैसी

कितनी तारीफ तेरे हुस्न की करे ‘शादाब’
वो दैर में बैठा ,हालत पीनेवालो जैसी !!!

कहो के इन्ताह है !!

2009 October 26
by Munda Sanichari

इश्क में आशिक महबूब बन जाये,तो कहो के इन्ताह है
मोहब्बत आँखों से झलक जाये, तो कहो के इन्ताह है
वस्ल की सदिया, लम्हों में गुज़र जाये, तो कहो के इन्ताह है
हर वक़्त उसकी साँसों को जीने का जी चाहे, तो कहो के इन्ताह है
क्या लिखे ‘शादाब’ इन्ताह-ऐ-इश्क पर ग़ज़ल
गर लफ्ज़ ही न मिल पाए तो कहो के इन्ताह है …

कैसे कहूँ के कितनी मोहब्बत है

2009 October 26
by Munda Sanichari

Love45454
कैसे नुमाया करूँ मेरे दिल के ये जज्बात
वो लफ्ज़ ही न बना पाया,जुबान बनाने वाला
[जुबान=language]

कैसे कहूँ के कितनी मोहब्बत है मुझको तुमसे
बस जानता हूँ के मुद्दतो में मिलता है, इतना चाहने वाला

पूछे है वो,इश्क की वजह रोज मुझसे दो चार
काफिर !! आज भी समझे है मेरा प्यार, वो ज़माने वाला

पास हूँ तो बीते है सदिया, लम्हों में मेरी
काश मिल जाये मुझको वो गुर, वक़्त चुराने वाला

मुस्कुराया तो बहुत मेरा सनम, ज़माने भर में
भाये है उसका मुझे हसीं अंदाज, वो रुलाने वाला

क्यों परेशां है ‘शादाब’, वस्ल की खातिर
तू खुदा तो नहीं,अहले-मुहब्बत को मिलाने वाला
[वस्ल=meeting,अहले-मुहब्बत=lover]

अब वीकएंड पर भी नहाने लगा हूं !!!

2009 September 30
by Munda Sanichari

Ooops !!! this time no shayari, no Urdu, no complicated words……….this poem is non-adult, I mean CertificateA.So if u r below 18, you must read……….otherwise leave it !!! :P

कहाँ थी कमी, और कहाँ था वक़्त, तेरे आने से पहले
तेरे चक्कर में ऐ जान-ऐ-जाना, अब काम से वक़्त चुराने लगा हूं …

ये कैसा सितम काफिर तेरा मेरे मोबाइल पर
कही बुझ न जाये ये चिराग, अब चार्जर भी साथ लेकर आने लगा हूं

आनी है दिवाली और दिल सफाई शुरू हुयी
मेरे दिल की चली न जाये बत्ती, तुझे दिल में जलाने लगा हूं

तेरे बदन से जो खुशबु महके और शमा रंगीन हो
कुछ तो भला किया तुने सनम,अब डीओडोरेंट के पैसे बचाने लगा हूं

तेरी बातो से फुर्सत कहा और तेरी यादो से वक़्त
जी भर के देखू तुझे,इसलिए अब वीकएंड पर भी नहाने लगा हूं

अब न कहना के बहुत अमीरी है तेरे मिलने में
यहाँ लुट चुका हूं मैं , बस कड़ी कोशिश से गरीबी छुपाने लगा हु

मेरी कविता इतनी फर्जी भी होगी,सोचा न था
देख तेरी मोहब्बत में मैं,क्या क्या क्या क्रेप गाने लगा हूं

ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ

2009 September 28
by Munda Sanichari


जब से आये हो जिंदगी में मेरे
चमन को बहारो का मतलब याद आया
दिल कहे, जीवन की ये बगिया तेरे नाम कर दूँ
ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ

पूछे है पगली, याद करते हो मुझे
कैसे कहू, हर शब्-ओ-सहर तेरी याद में डूबे है
हर वक़्त जो दिल धडके है तेरी खातिर, उसकी हर शाम तेरे नाम कर दूँ
ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ

हर सुबह का आगाज़ तुम्ही से
हर शाम तेरे नाम से ढले
हर जाम से पहले कहू ‘बिस्मिल्लाह’,हर वो जाम तेरे नाम कर दूँ
ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ

वो रोये है तो बरसे है बादल इधर भी
हँसे है तो खिले है फूल इधर भी
तेरी हर मुस्कराहट पर,ये मेरी जान तेरे नाम कर दूँ
ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ

सन्देश दीक्षित