लफ्जों में बयां करूँ कैसे
2009 September 20

वो पूछे है,के याद करते हो मुझे
काफिर!!सोज़-ऐ-दिल,लफ्जों में बयां करूँ कैसे
[सोज़=pain]
वो देखे है,अक्स-ऐ-खुदा मुझमें,मैं उनमें
पिजीराफ्ता-ऐ-मोहब्बत जबां करूँ कैसे
[पिजीराफ्ता - accepted]
वो रोये है वहा,शररबार इधर बरसे
उसके हर इक गिरिया का हक़ अदा करूँ कैसे
[शररबार =raining sparks of fire,गिरिया=tear]
ये माना के ना वस्ल-ऐ-यार होगा कभी
पर इस दिल को तेरे दिल से जुदा करूँ कैसे
[वस्ल=meeting]
– सन्देश दिक्षित
Wah, aapne vo likh diya jo aasani se likha nahi ja sakta, your words force the reader to feel what a lover can feel but can’t give words to his feelings…..
ये माना के ना वस्ल-ऐ-यार होगा कभी
पर इस दिल को तेरे दिल से जुदा करूँ कैसे.nice
Thanks !!!
जियूँ ना इस हाल तो फिर मरुँ कैसे ,
होऊं जो बदहाल तो ना फिरूँ कैसे
जगाया है उम्मीद-ए-ईमान मैंने उसमें
नज़रों में ऊँचा होऊं ना तो फिर गिरूँ कैसे
कुछ उसका कसूर और कुछ वादे का मेरे
करूँ जो ना वादा तो फिर रहूँ कैसे
यकीं उसपे है जितना के खुदा पे नहीं
बाज आऊं भी कहीं कुफ्र से तो यकीं करूँ कैसे
ताब-ए-रहनुमाई नहीं उसको अब ‘सागर’
मोहसिन बगैर सफ़र मैं ये करूँ कैसे .
- शेखर
Expert comment with excellent composition !!!
Thanks buddy ….!!! Its juz because of u
……..myyyyy..i felt as if dat nectarfall ws u only..m as pious as wen i ws born!!!!!