दुःख

तुमसे दूर होने का दुःख
सच कहूँ तो
उदास नहीं होता मैं
बस सवाल सा पूछ लेता हूँ
कि इन सीली किताबो में
गुलाब की पत्तियाँ
जो मेरी हर ग़ज़ल पर
तुम छुपा गयी
क्या इसलिए
कि जब तुम न हो
तो ये खुशबु
आंसुओ का सबब बन
इन पन्नो को और नुमाया कर दे

घर में आज दिवाली है ..

.

मैं बैठा दूर परदेश में
घर में आज दिवाली है
मेरा आँगन सूना है
माँ की आँखों में लाली है
.
वो बार बार मुझे बुलाती है
फिर अपने दिल को समझाती है
मेरी भाग्य की चिंता पर
अपने मातृत्व को मनाती है
.
मैं कितना खुदगर्ज़ हुआ
पैसो की खातिर दूर हुआ
मेरा मन तो करता है
पर न जाने क्यूँ मजबूर हुआ
.
आज फटाको की आवाजों में
मेरी ख़ामोशी झिल्लाती  है
कैसे बोलूं माँ तुझको
तेरी याद मुझे बहुत आती है
.
इतना रोया मैं, आज कि
मेरी आँखें अब खाली है
तुझ से दूर मेरे जीवन की
ये पहली एक दिवाली है
.
माँ,मेरा आँगन सूना है
तेरी की आँखों में लाली है …..

माँ …

Today is mother’s day ..I am rarely believes in these ‘day concepts‘ but somewhere we changes even though we don’t want to be,because the people are changing around.Anyways,I have tried to write something on this topic better to say on the strongest relation,on the best creature of GOD.This is the subject which is tough for me to write upon,I don’t have words to describe it but still I managed to write few lines.The only thing which I want to share is that I was crying whole time while writing this poem …I don’t know why !!!

तू कितनी सुन्दर ,तू कितनी प्यारी है माँ
दुःख सह कर कितने,मेरी जिंदगी सवारी है माँ
खुद गीले में सोयी,मुझको सूखे में सुलाया
मेरी हंसी की खातिर,अपनी हर ख़ुशी को भुलाया

माँ, याद मुझे है आज भी वो पल,जब में पढता था, तू स्वेटर बुनती थी
मैं पढ़ लिख कर कुछ बन जाऊ,इसलिए मेरे साथ रात भर जगती थी
याद है वो दिन,जब अख़बार में मेरा रिजल्ट आया था
आटे से सने हाथो से तूने सीने से मुझे लगाया था
फिर मेरे माथे पर रोली का तिलक लगा, भेज दिया कुछ बनने को
अपने से दूर इस मशीनी दुनिया में,अपने सपने सच करने को

आज भी मेरे कांधे पर, तेरे आंसुओ की नमी है
सब कुछ है मेरे पास माँ, बस तेरी एक कमी है
मखमली बिस्तर है,पर तेरी गोद अखरती है
तेरे आँचल की छाँव को, मेरी आँखें तरसती है

थक चूका हूँ माँ,जीवन की इस भागम भाग से
इस बेसुरे संगीत से,इस नीरस राग से
मुझे तो एक सिर्फ तेरी लोरी सुहाआएगी
तेरी गोद में आकर ही अब मुझको नींद आएगी

मुझे भी मेरे बेटे होने का फ़र्ज़ निभाने दे
तेरे पाक दूध का कुछ तो क़र्ज़ चुकाने दे
एक बार बुला ले माँ,सब कुछ छोड़ चला आऊंगा
तेरे आँचल को छोड़, फिर कभी कही नहीं जाऊंगा
कभी कही नहीं जाऊंगा,कभी कही नहीं जाऊंगा…..

लगे के तुम हो ….

जब पर्वतो से बादल टकराए तो लगे के तुम हो
ठंडी बयार मेरे तन को छू जाये तो लगे के तुम हो
सड़के जो बल खाकर इतराए तो लगे के तुम हो
और जो तेरी याद मेरे लब पर आ मुस्कुराये तो लगे के तुम हो

चाँद बादल में छुप, मुझ को यूँ सताए तो लगे के तुम हो
फिर वो चांदनी मेरे तन पर बिखर जाये तो लगे के तुम हो
इन वादियों में कोई आवाज आज भी यूँ ही कही
मुझे पुकार कर छुप जाये,तो लगे के तुम हो

तेरा ख्याल बन आंसू, मुझको जो रुलाये तो लगे के तुम हो
और तेरी यादो का आँचल मुझ को सुला जाये तो लगे के तुम हो
हर पल में तुम हो और तुम ही रहो सदा , यही दुआ उस रब से
पर जब देखूं हूँ उस रब को बंद आँखों से मैं ,तो उसमें भी लगे के तुम हो

किस पर लिखूँ ??

आज फिर सोच में बैठा,क्या लिखूँ,किस पर लिखूँ
कोई एक एहसास तो ऐसा हो,जिस पर लिखूँ

महबूब के पावन प्यार पर लिखूँ
दर्पण में रचते श्रृंगार पर लिखूँ
नमकीन मोहब्बत की बातें लिखूँ
या इश्क की मीठी तकरार पर लिखूँ

दुनिया की दुनियादारी पर लिखूँ
पैसे की बढती खुमारी पर लिखूँ
महंगी कारों में बैठे लोगो पर लिखूँ
या कहीं रोटी की लाचारी पर लिखूँ

राजनीति में भिखरे खून पर लिखूँ
खून पे होती राजनीति पर लिखूँ
करोडो की चढ़ती माला पर लिखूँ
या माला पर चढ़ती कूटनीति पर लिखूँ

स्वार्थी होते एहसासों पर लिखूँ
पैसे पर बिकते जज्बातों पर लिखूँ
धोखे में डूबे दिन पर लिखूँ
या अय्यासी में भीगी रातो पर लिखूँ

तड़प रही कलम मेरी,भावना विहीन हो अब
तुम ही बताओ प्रिय,क्यों ऐसे संसार पर लिखूँ …

इक तन्हाई भी मिलती है …

दिन भर करता हूँ बातें तुमसे,चेहरे पर हंसी रहती है
पर यकीं मान,इक ख़ामोशी मेरे दिल में भी पलती है

यूँ तो है हर पल तू मेरे साथ,जागते सोते में मेरे
पर इस दिल में आके कभी, इक तन्हाई भी मिलती है

तू गर समझे है कि तुझे है दुःख मुझसे ना मिल पाने का कभी
कभी आके देख दिल में मेरे,हिज्र की आग मेरे दिल में भी जलती है

क्यों होती है तू परेशां इतना,क्यों आंसू ही बहाती है
ये प्यार की लगन है पागल ,किस्मत वालो को ही लगती है

ना शौक मुझे सुखन का ‘शादाब’ ,ना लिखने की ही कोई चाहत
दर्द, शब्दों से जब मिलते है तो इक तस्सली सी मिलती है

हमने मंदिर मस्जिद पाले है

मैं रहता हूँ ऐसे वन में
जहा लीर नहीं मनुज के तन में
जहा भूख सर्द रातो में सोती है
जहा किस्मत अपने पर रोती है
जहा दो टूक रोटी के भी लाले है
पर हमने मंदिर मस्जिद पाले है

है रंग का खून का लाल तेरा भी और मेरा भी
होता है तेरी जिंदगी में नित नया एक सवेरा भी
तू भी दिन को जगता है,रातो को सोता है
तेरे दिल में भी मेरे जैसा हृदुय स्पंदन होता है

फिर तू क्यों मुझसे रूठ गया
क्यों मंदिर मस्जिद पर टूट गया
क्यों खून बहाया तूने होली में
क्यों आग लगा दी बहनों की डोली में

क्यों भूल गया,तू पला बढ़ा है इस भारत की झोली में
कैसे प्यार का क़र्ज़ चुकाया,तेरी बन्दूको की गोली ने
तू दुश्मन की बातों में आया,भूल गया उस हंसी ठिठोली को
माँ के सीने में खंजर घोपा,भूल गया उस पावन लोरी को

इस तरह गर तू ,धर्म नाम पर कटता जायेगा
ये देश यूँ ही ,टुकडो में बटता जायेगा
और जब,विश्वपटल पर ये देश ही नहीं रहेगा
तो कहाँ हिन्दू और कहाँ मुस्लमान रहेगा

चलो प्रिय आज फिर से यूँ ,प्यार के गीत गाते है

मैं लिखता था किताबो में,तुम पढ़ के सुनाती थी
मेरे हर लफ्जों को यूँ ,अपने लब से चुराती थी
धडकते थे दिल जिनसे,वो नगमें गुनगुनाते है
चलो प्रिय आज फिर से यूँ ,प्यार के गीत गाते है

वो मेरे काँधे पर रख सर,तुम यूँ ही सो जाती थी
तेरे जिस्म में,मेरी रूह जाने कहाँ खो जाती थी
ऐसे कुछ मिलन के पल,फिर से संग बिताते है
चलो प्रिय आज फिर से यूँ ,प्यार के गीत गाते है

वो रातो को हाथो में हाथ लिए, चाँद को निहारते थे
छत पर बैठे रात भर,अपने प्यार उसे कितना जलाते थे
आज फिर उसी चाँद को ,अपना मिलन दिखाते है
चलो प्रिय आज फिर से यूँ ,प्यार के गीत गाते है

तेरी आँखों से जो अश्क, मेरी पलकों पर गिरता था
मेरे दिल की तन्हाई को, सिर्फ तेरा दिल समझता था
बहुत वक़्त हुआ,अब फिर से,दिल को दिल से मिलाते है
चलो प्रिय आज फिर से यूँ ,प्यार के गीत गाते है

चाँद भी कुछ खफा सा लगता है


मेरी हर रात अब इतनी ही काली हैं
खुद जलता हूँ तो उजाला होता है
तड़पता रहता हूँ इल्जामो में तेरे
बड़ी ही देर से ये सवेरा होता है

ये चाँद भी कुछ खफा सा लगता है
अब करता नहीं है रोशिनी उतनी
भुझा सा है,चमकता भी नहीं है अब
शायद, महबूब इसका भी जुदा सा लगता है

और ये जो तारे है,टिमटिमाते थे रात भर
बीत जाती थी रात उन्हें देख कर
सोचा था की कभी आँचल में भर दूंगा तेरे, इनको
आज बिखर से गए है, रखा था इतना सहेज कर

जानता हूँ,मुझे तड़पाकर,तू भी नहीं सोती होगी
भूलो चाहे कितना भी,पर याद तो आती होगी
आँखें जो मूँद ली है तूने मुझसे
पर सूरत तो मेरी,तेरे दिल में नज़र आती होगी

चलो आज खुद पर कुछ लिखतें है…..

I am in lite mood today …..was thinking abt my past life,I come from a very very conservative and religious family.My grand father was Mehant of famous Dhwarikadhish temple in Mathura.It can give u a thot dat wat restriction I had to enter in dis real world(real???)…….Today I m thinking ….how the change happened,How a brij ka lal converts to natwar lal [:D]….. how spirituality converts into practicality…..how yog converts to bhog:P ……hey chaps,y r u so serious..abey main nahi hua jindagi mein tum kahe :P ……chalo ,let me giv it a shot

चलो आज खुद पर कुछ लिखतें है
दुनिया को तो बहुत पढ़ा
कुछ अपने को भी पढ़ते है

तो फिर ले हरि का नाम “संदेशोपरायण” प्रारंभ करते है
गलती से प्रथ्वी पर आई,इस भूल का आरम्भ करते है
बहुत सारे chapter है इसमें
एक चेहरे के multi character है इसमें
इसमें ज्योतिष भी है कवि भी है
अँधेरे को चीरती एक छवि भी है
ये हँसाता भी है,ये रुलाता भी है
कभी कभी ज्ञान की बातें बताता भी है
ये दुनिया घूमता है ,ये फोटो खीचता है
विचारो के हल से,बंजर दिमाग को सींचता है
ये पागल लोगो के लिए dear है
गलती से बना एक इंजिनियर है
इन्हें degree देकर college रोता है
क्या देश में इतना बड़ा फर्जीवाडा भी होता है
खैर छोडिये साहब,अब काहे पोल खोले
बाढ़ आ जाएगी,काहे hole खोले

शुरुआत जन्म से करते है
पिछले जन्म में किये अच्छे कर्म से करते है
पावन धरती मथुरा के पुण्य कुछ ज्यादा थे
देवता इसे स्वर्ग बनाने पर आमादा थे
फिर GOD ने सोचा के चलो कुछ नया present करते है
ऐसे तो public बोर हो जाएगी,इसी को sent करते है
कान्हा और इनके जन्म में सिर्फ एक सड़क का फासला था
ये सड़क के इस पार hospital में अवतरित हुए ,उन्हें देवकी ने उस पार पाला था
ब्रज का होने का इन्हें बहुत बड़ा भोकाल है
कान्हा समझते है अपने को,पर गोपियों का अकाल है
बांसुरी बजाते है ,लोगो को नचाते भी है
खाते खूब है,फिर भांग से पचाते भी है
बचपन इनका कुञ्ज गलियों में बीत गया
विडियो गेम खेलने का time,गीता सार में रीत गया
और अब इस उम्र में video game खेल रहे है
आते जाते हर किसी पर गीता इश्लोक पेल रहे है

खैर वक़्त ने करवट बदली
हो गयी इनके पापा क़ी बदली……To Be continue !!!

abhi aaage bhi hai bhai ……in next sequel u will find how a brij ka gwala converts to a rajasthani bhaya :D …..dekhte rahiye,padhte rahiye…….haan hanse rahiye !!!