kya yahi manuj hai?


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अधीर अधर पर राम प्रकट है ,
व्यथा विकट या काल निकट है

सबल हाथ ,जग सकल साथ है ,
निर्बल ही को बस जग्गंनाथ है .

जीत का अब उन्माद थका है ,
थके हार कटु स्वाद चखा है .

जब तक था माया का साया ,सहज कभी तू याद न आया ,
पर जब सूर्य ढला और तुम गहराया , ह्रदय ओअत में प्रभु नाम समाया .

भक्ति का संगीत नहीं ये दुह-वक्त की चीत्कार है ,
दे शरण कर दुख हरण ये तट नहीं मंझधार है .

धन जीवन ,मन मोह बंधन ,सखा यही बस यही अनुज है ,
आजीवन संचय में मगन ,छल लोभ स्वार्थ ,क्या यही मनुज है ?

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2 thoughts on “kya yahi manuj hai?

  1. “क्या यही मनुज है ? ” Not now anyway, we have left that a long back. Somewhere long back we can now just discuss it as history.

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