मुझे कल पर मेरे ऐतबार है कोई ?


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ये मसरूफियत है या नावाकिफ तेरे
पर जो भी है दिल-ऐ-फुगाँ है कोई ?
[मसरूफियत=busy,नावाकिफ=not aware,फुगाँ=spear]

ये इज़्तराब है गुफ्तगू का मेरे
वो काफिर समझे है,या तगाफुल है कोई ?
[इज़्तराब=restlessness,गुफ्तगू=talk,तगाफुल=ignorance]

बहुत उस्तवार है ज़िस्त-ऐ-तुलानी में अपने
मुझे कल पर मेरे ऐतबार है कोई ?
[उस्तवार=proud,ज़िस्त-ऐ-तुलानी=length of life]

कब पिगलेगा बुत,दिल-ऐ-जज़्बात पे मेरे
वो दिल है,या संग-ओ-खिस्त है कोई ?
[संग-ओ-खिस्त=brick of stone]

— सन्देश दिक्षित

PS – For hindi version of this nazm click here

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3 thoughts on “मुझे कल पर मेरे ऐतबार है कोई ?

  1. चारागर चाहे के हो बड़ा कोई
    मेरे दिल की दवा करे कोई

    रातें कट रही खुली आखें
    सर के रखने को जानू मिले कोई

    गज़लों से मरहम किये बहोत दिल पे
    रूह के पैबंद भी अब सिये कोई

    रोते हैं बेबाकी से हम तो रंज नहीं
    बस हमपे इस तरह जो न हँसे कोई

    शाम उम्मीदों में गुज़र ही जायेगी
    फिकरे नाकाम मुहब्बत के जो ना कसे कोई

    अब रहना यहाँ मुहाल है ‘सागर’
    वहाँ चल के जानकार ना बसे कोई .
    – शेखर

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