चाँद भी कुछ खफा सा लगता है



मेरी हर रात अब इतनी ही काली हैं
खुद जलता हूँ तो उजाला होता है
तड़पता रहता हूँ इल्जामो में तेरे
बड़ी ही देर से ये सवेरा होता है

ये चाँद भी कुछ खफा सा लगता है
अब करता नहीं है रोशिनी उतनी
भुझा सा है,चमकता भी नहीं है अब
शायद, महबूब इसका भी जुदा सा लगता है

और ये जो तारे है,टिमटिमाते थे रात भर
बीत जाती थी रात उन्हें देख कर
सोचा था की कभी आँचल में भर दूंगा तेरे, इनको
आज बिखर से गए है, रखा था इतना सहेज कर

जानता हूँ,मुझे तड़पाकर,तू भी नहीं सोती होगी
भूलो चाहे कितना भी,पर याद तो आती होगी
आँखें जो मूँद ली है तूने मुझसे
पर सूरत तो मेरी,तेरे दिल में नज़र आती होगी

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4 thoughts on “चाँद भी कुछ खफा सा लगता है

  1. My fav lines in this

    ‘और ये जो तारे है,टिमटिमाते थे रात भर
    बीत जाती थी रात उन्हें देख कर
    सोचा था की कभी आँचल में भर दूंगा तेरे, इनको
    आज बिखर से गए है, रखा था इतना सहेज कर”

    Mast hai ek dum …
    dard ko kya highlight karke likha hai…

    saaf pata lagta hai ki ishq ki aag dono taraf barabar hai,
    is zamaane ke julam se dono juda juda hai !!!

  2. मेरी हर रात अब इतनी ही काली हैं
    खुद जलता हूँ तो उजाला होता है…….

    kya baat hai……………..

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