तू गर हमसफ़र भी होता तो क्या होता


आतिश-ऐ-इश्क में जलना था मुझे अकेला,तू गर साथ भी होता तो क्या होता
जब मरना ही था मुझे प्यासा, तो तू समुंदर भी होता तो क्या होता

दिल से निकले पाक-ऐ-अश्क को भी तुने जो बहाना माना
यकीं तुझे मुझ पर इतना तो फिर वो लहू भी होता तो क्या होता

मर तो यूँ भी रहा हूँ काफिर तेरे हाथो से में
तू महबूब न हो,दम-साज़ भी होता तो क्या होता
[दम-साज़ = जल्लाद]

हम तो चले फ़क़त उन रास्तो पर जिनकी कोई मंजिले न थी
किस्मत में था अकेला चलना,तू गर हमसफ़र भी होता तो क्या होता

बहुत निकला इस दिल से प्यार,पर खुद से हारे है ‘शादाब’
ये दिल अगर दिल न हो पत्थर भी होता तो क्या होता

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7 thoughts on “तू गर हमसफ़र भी होता तो क्या होता

  1. Boss, I really dont have any words, I cant comment on this gazal.
    You have spoken my heart here.
    Shaala aisa lagata hai ki, mera dil khula pada hai wahan par..

  2. jo mere ishq ke junoon ko samaja na tu
    gar tera ikraar bhi hota to kya hota

    zindagi ke safar mein hum akele hi bhale
    tera saath hota to bhi paraya hi hota

    – Anjum

  3. नमस्कार,
    क्या बात है आजकल बहुत बढ़िया लिख रहे हो…
    मजा आ गया… 🙂

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