उल्फत-ऐ-यार लिख जाऊं किस तरह


हूँ चुप अरसे से,ये कहानी सुनाऊं किस तरह
जो दिल में लगी है आग,बुझाऊं किस तरह

ना पूछ काफिर, क्या पाया,खोया इश्क में मैंने
दिल का दर्द है नासूर ,लफ्जों पर लाऊं किस तरह

मेरे सीने में लहू-ऐ-इश्क बहता है अब तलक
उस बेवफा-ऐ-हुस्न को, दीदार कराऊँ किस तरह

लोग कहते है के मेरे आगोश में अँधेरा है
आतिश-ऐ-मोहब्बत, दिखाऊं किस तरह

वो आगाज़ को अंजाम समझे है अभी तक
ये दरिया-ऐ-इश्क है,उन्हें समझाऊं किस तरह

जिस कलम से कभी,हाल-ऐ-दिल लिखा था ‘शादाब’
फिर उसी से,उल्फत-ऐ-यार लिख जाऊं किस तरह

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One thought on “उल्फत-ऐ-यार लिख जाऊं किस तरह

  1. dil ka wo choor dikhaun kis trah…
    eee yaar tujhe waha le jaaun kis trah…
    chahat main teri likhe hain do shabad main…
    inki mulakaat tujhse krwau kis trah…!

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