इश्क को इख्तियार ना था


तुमको जो मेरे वादे पर ऐतबार ना था
वो कुछ और ही था,फ़क़त प्यार ना था

आज भी यूँ गुज़रे है,यादों में राते मेरी
गर क्या जो मैं, तेरी महफ़िल में शुमार ना था

क्यूँ कर के हुए इस अहद-ऐ-दुनिया में बदनाम
होश में हम ना थे,इश्क को इख्तियार ना था

अब क्यों देखते हो आसमां के जानिब. फरिस्तो
वो खाक ना थी,उश्शाक का गुबार ना था

हम तो यूँ ही चलते रहे उन्ही मंजिलो की ओर
रहगुज़र पर हमारा,किसी को इंतज़ार ना था

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