क्यूँ बुतों को छुपाते हो दोस्तों


काफिरों की बस्ती में,क्यूँ बुतों को छुपाते हो दोस्तों
क्यों नकाबपोशो से फिर यूँ,रिश्ते निभाते हो दोस्तों

तुम ही तो बेचते हो फसाद-ऐ-मजहब का सामान
फिर क्यूँ हिन्दू-ओ-मुसल्मा को भाई बनाते हो दोस्तों

बड़े अदब से मिलते हो, आजकल हर इंसा से तुम
ये जोहर-ऐ-बेशर्मी-ऐ-गुफ्तार कहाँ से लाते हो दोस्तों

एक भी कतरा नहीं,और हज़ारो खूं है सर पर
ये पाक-ऐ-दामन कहाँ से सिलाते हो दोस्तों

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2 thoughts on “क्यूँ बुतों को छुपाते हो दोस्तों

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