कैसे लिखूं ?

बंद कांच में बैठे
जेठ की दुपहरी
नंगे पाव , सड़क पर चलते उस जिस्म
को देखकर
कोई तो इंसान है
जो चीखता है मेरे भीतर

सोचता हूँ कुछ लिख दूँ

पर
कैसे लिखूं ?
उसकी मुस्कराहट को
जिसे बचपन ने रोना ही सिखाया है
और फिर
हँसते चेहरे पर
कोई भीख भी तो नहीं देता

कैसे लिखूं ?
उसके घर को
जो चौराहे पर
किसी पेड़ के नीचे
शायद आज है
कल नहीं होगा

कैसे लिखूं ?
उस ठंडी बयार को
जो गाडी के शीशे खुलने पर
उसके बदन से टकरा
उसकी आँखों में चमकती है

कैसे लिखूं ?
वो एक या दो रूपये का सुख
जो वो अब सीधे जाकर
अपने बाप को देगी
वो खरीद लेगा
एक बोतल
और कुछ बीडी के बण्डल

अब हम भीख नहीं देते
बुद्दिजीवी हो गए है
देंगे तो ये लोग और बढेंगे
और फिर बहुत सारे और तर्क

फिर क्या करे ?
तड़पने दे बचपन को
वही जेठ की दुपहरी
नंगे पैर
अधनंगे बदन में ……..

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दुःख

तुमसे दूर होने का दुःख
सच कहूँ तो
उदास नहीं होता मैं
बस सवाल सा पूछ लेता हूँ
कि इन सीली किताबो में
गुलाब की पत्तियाँ
जो मेरी हर ग़ज़ल पर
तुम छुपा गयी
क्या इसलिए
कि जब तुम न हो
तो ये खुशबु
आंसुओ का सबब बन
इन पन्नो को और नुमाया कर दे

घर में आज दिवाली है ..

.

मैं बैठा दूर परदेश में
घर में आज दिवाली है
मेरा आँगन सूना है
माँ की आँखों में लाली है
.
वो बार बार मुझे बुलाती है
फिर अपने दिल को समझाती है
मेरी भाग्य की चिंता पर
अपने मातृत्व को मनाती है
.
मैं कितना खुदगर्ज़ हुआ
पैसो की खातिर दूर हुआ
मेरा मन तो करता है
पर न जाने क्यूँ मजबूर हुआ
.
आज फटाको की आवाजों में
मेरी ख़ामोशी झिल्लाती  है
कैसे बोलूं माँ तुझको
तेरी याद मुझे बहुत आती है
.
इतना रोया मैं, आज कि
मेरी आँखें अब खाली है
तुझ से दूर मेरे जीवन की
ये पहली एक दिवाली है
.
माँ,मेरा आँगन सूना है
तेरी की आँखों में लाली है …..

माँ …

Today is mother’s day ..I am rarely believes in these ‘day concepts‘ but somewhere we changes even though we don’t want to be,because the people are changing around.Anyways,I have tried to write something on this topic better to say on the strongest relation,on the best creature of GOD.This is the subject which is tough for me to write upon,I don’t have words to describe it but still I managed to write few lines.The only thing which I want to share is that I was crying whole time while writing this poem …I don’t know why !!!

तू कितनी सुन्दर ,तू कितनी प्यारी है माँ
दुःख सह कर कितने,मेरी जिंदगी सवारी है माँ
खुद गीले में सोयी,मुझको सूखे में सुलाया
मेरी हंसी की खातिर,अपनी हर ख़ुशी को भुलाया

माँ, याद मुझे है आज भी वो पल,जब में पढता था, तू स्वेटर बुनती थी
मैं पढ़ लिख कर कुछ बन जाऊ,इसलिए मेरे साथ रात भर जगती थी
याद है वो दिन,जब अख़बार में मेरा रिजल्ट आया था
आटे से सने हाथो से तूने सीने से मुझे लगाया था
फिर मेरे माथे पर रोली का तिलक लगा, भेज दिया कुछ बनने को
अपने से दूर इस मशीनी दुनिया में,अपने सपने सच करने को

आज भी मेरे कांधे पर, तेरे आंसुओ की नमी है
सब कुछ है मेरे पास माँ, बस तेरी एक कमी है
मखमली बिस्तर है,पर तेरी गोद अखरती है
तेरे आँचल की छाँव को, मेरी आँखें तरसती है

थक चूका हूँ माँ,जीवन की इस भागम भाग से
इस बेसुरे संगीत से,इस नीरस राग से
मुझे तो एक सिर्फ तेरी लोरी सुहाआएगी
तेरी गोद में आकर ही अब मुझको नींद आएगी

मुझे भी मेरे बेटे होने का फ़र्ज़ निभाने दे
तेरे पाक दूध का कुछ तो क़र्ज़ चुकाने दे
एक बार बुला ले माँ,सब कुछ छोड़ चला आऊंगा
तेरे आँचल को छोड़, फिर कभी कही नहीं जाऊंगा
कभी कही नहीं जाऊंगा,कभी कही नहीं जाऊंगा…..

लगे के तुम हो ….

जब पर्वतो से बादल टकराए तो लगे के तुम हो
ठंडी बयार मेरे तन को छू जाये तो लगे के तुम हो
सड़के जो बल खाकर इतराए तो लगे के तुम हो
और जो तेरी याद मेरे लब पर आ मुस्कुराये तो लगे के तुम हो

चाँद बादल में छुप, मुझ को यूँ सताए तो लगे के तुम हो
फिर वो चांदनी मेरे तन पर बिखर जाये तो लगे के तुम हो
इन वादियों में कोई आवाज आज भी यूँ ही कही
मुझे पुकार कर छुप जाये,तो लगे के तुम हो

तेरा ख्याल बन आंसू, मुझको जो रुलाये तो लगे के तुम हो
और तेरी यादो का आँचल मुझ को सुला जाये तो लगे के तुम हो
हर पल में तुम हो और तुम ही रहो सदा , यही दुआ उस रब से
पर जब देखूं हूँ उस रब को बंद आँखों से मैं ,तो उसमें भी लगे के तुम हो

किस पर लिखूँ ??

आज फिर सोच में बैठा,क्या लिखूँ,किस पर लिखूँ
कोई एक एहसास तो ऐसा हो,जिस पर लिखूँ

महबूब के पावन प्यार पर लिखूँ
दर्पण में रचते श्रृंगार पर लिखूँ
नमकीन मोहब्बत की बातें लिखूँ
या इश्क की मीठी तकरार पर लिखूँ

दुनिया की दुनियादारी पर लिखूँ
पैसे की बढती खुमारी पर लिखूँ
महंगी कारों में बैठे लोगो पर लिखूँ
या कहीं रोटी की लाचारी पर लिखूँ

राजनीति में भिखरे खून पर लिखूँ
खून पे होती राजनीति पर लिखूँ
करोडो की चढ़ती माला पर लिखूँ
या माला पर चढ़ती कूटनीति पर लिखूँ

स्वार्थी होते एहसासों पर लिखूँ
पैसे पर बिकते जज्बातों पर लिखूँ
धोखे में डूबे दिन पर लिखूँ
या अय्यासी में भीगी रातो पर लिखूँ

तड़प रही कलम मेरी,भावना विहीन हो अब
तुम ही बताओ प्रिय,क्यों ऐसे संसार पर लिखूँ …

इक तन्हाई भी मिलती है …

दिन भर करता हूँ बातें तुमसे,चेहरे पर हंसी रहती है
पर यकीं मान,इक ख़ामोशी मेरे दिल में भी पलती है

यूँ तो है हर पल तू मेरे साथ,जागते सोते में मेरे
पर इस दिल में आके कभी, इक तन्हाई भी मिलती है

तू गर समझे है कि तुझे है दुःख मुझसे ना मिल पाने का कभी
कभी आके देख दिल में मेरे,हिज्र की आग मेरे दिल में भी जलती है

क्यों होती है तू परेशां इतना,क्यों आंसू ही बहाती है
ये प्यार की लगन है पागल ,किस्मत वालो को ही लगती है

ना शौक मुझे सुखन का ‘शादाब’ ,ना लिखने की ही कोई चाहत
दर्द, शब्दों से जब मिलते है तो इक तस्सली सी मिलती है

हमने मंदिर मस्जिद पाले है

मैं रहता हूँ ऐसे वन में
जहा लीर नहीं मनुज के तन में
जहा भूख सर्द रातो में सोती है
जहा किस्मत अपने पर रोती है
जहा दो टूक रोटी के भी लाले है
पर हमने मंदिर मस्जिद पाले है

है रंग का खून का लाल तेरा भी और मेरा भी
होता है तेरी जिंदगी में नित नया एक सवेरा भी
तू भी दिन को जगता है,रातो को सोता है
तेरे दिल में भी मेरे जैसा हृदुय स्पंदन होता है

फिर तू क्यों मुझसे रूठ गया
क्यों मंदिर मस्जिद पर टूट गया
क्यों खून बहाया तूने होली में
क्यों आग लगा दी बहनों की डोली में

क्यों भूल गया,तू पला बढ़ा है इस भारत की झोली में
कैसे प्यार का क़र्ज़ चुकाया,तेरी बन्दूको की गोली ने
तू दुश्मन की बातों में आया,भूल गया उस हंसी ठिठोली को
माँ के सीने में खंजर घोपा,भूल गया उस पावन लोरी को

इस तरह गर तू ,धर्म नाम पर कटता जायेगा
ये देश यूँ ही ,टुकडो में बटता जायेगा
और जब,विश्वपटल पर ये देश ही नहीं रहेगा
तो कहाँ हिन्दू और कहाँ मुस्लमान रहेगा

चलो प्रिय आज फिर से यूँ ,प्यार के गीत गाते है

मैं लिखता था किताबो में,तुम पढ़ के सुनाती थी
मेरे हर लफ्जों को यूँ ,अपने लब से चुराती थी
धडकते थे दिल जिनसे,वो नगमें गुनगुनाते है
चलो प्रिय आज फिर से यूँ ,प्यार के गीत गाते है

वो मेरे काँधे पर रख सर,तुम यूँ ही सो जाती थी
तेरे जिस्म में,मेरी रूह जाने कहाँ खो जाती थी
ऐसे कुछ मिलन के पल,फिर से संग बिताते है
चलो प्रिय आज फिर से यूँ ,प्यार के गीत गाते है

वो रातो को हाथो में हाथ लिए, चाँद को निहारते थे
छत पर बैठे रात भर,अपने प्यार उसे कितना जलाते थे
आज फिर उसी चाँद को ,अपना मिलन दिखाते है
चलो प्रिय आज फिर से यूँ ,प्यार के गीत गाते है

तेरी आँखों से जो अश्क, मेरी पलकों पर गिरता था
मेरे दिल की तन्हाई को, सिर्फ तेरा दिल समझता था
बहुत वक़्त हुआ,अब फिर से,दिल को दिल से मिलाते है
चलो प्रिय आज फिर से यूँ ,प्यार के गीत गाते है

चाँद भी कुछ खफा सा लगता है


मेरी हर रात अब इतनी ही काली हैं
खुद जलता हूँ तो उजाला होता है
तड़पता रहता हूँ इल्जामो में तेरे
बड़ी ही देर से ये सवेरा होता है

ये चाँद भी कुछ खफा सा लगता है
अब करता नहीं है रोशिनी उतनी
भुझा सा है,चमकता भी नहीं है अब
शायद, महबूब इसका भी जुदा सा लगता है

और ये जो तारे है,टिमटिमाते थे रात भर
बीत जाती थी रात उन्हें देख कर
सोचा था की कभी आँचल में भर दूंगा तेरे, इनको
आज बिखर से गए है, रखा था इतना सहेज कर

जानता हूँ,मुझे तड़पाकर,तू भी नहीं सोती होगी
भूलो चाहे कितना भी,पर याद तो आती होगी
आँखें जो मूँद ली है तूने मुझसे
पर सूरत तो मेरी,तेरे दिल में नज़र आती होगी

चलो आज खुद पर कुछ लिखतें है…..

I am in lite mood today …..was thinking abt my past life,I come from a very very conservative and religious family.My grand father was Mehant of famous Dhwarikadhish temple in Mathura.It can give u a thot dat wat restriction I had to enter in dis real world(real???)…….Today I m thinking ….how the change happened,How a brij ka lal converts to natwar lal [:D]….. how spirituality converts into practicality…..how yog converts to bhog:P ……hey chaps,y r u so serious..abey main nahi hua jindagi mein tum kahe 😛 ……chalo ,let me giv it a shot

चलो आज खुद पर कुछ लिखतें है
दुनिया को तो बहुत पढ़ा
कुछ अपने को भी पढ़ते है

तो फिर ले हरि का नाम “संदेशोपरायण” प्रारंभ करते है
गलती से प्रथ्वी पर आई,इस भूल का आरम्भ करते है
बहुत सारे chapter है इसमें
एक चेहरे के multi character है इसमें
इसमें ज्योतिष भी है कवि भी है
अँधेरे को चीरती एक छवि भी है
ये हँसाता भी है,ये रुलाता भी है
कभी कभी ज्ञान की बातें बताता भी है
ये दुनिया घूमता है ,ये फोटो खीचता है
विचारो के हल से,बंजर दिमाग को सींचता है
ये पागल लोगो के लिए dear है
गलती से बना एक इंजिनियर है
इन्हें degree देकर college रोता है
क्या देश में इतना बड़ा फर्जीवाडा भी होता है
खैर छोडिये साहब,अब काहे पोल खोले
बाढ़ आ जाएगी,काहे hole खोले

शुरुआत जन्म से करते है
पिछले जन्म में किये अच्छे कर्म से करते है
पावन धरती मथुरा के पुण्य कुछ ज्यादा थे
देवता इसे स्वर्ग बनाने पर आमादा थे
फिर GOD ने सोचा के चलो कुछ नया present करते है
ऐसे तो public बोर हो जाएगी,इसी को sent करते है
कान्हा और इनके जन्म में सिर्फ एक सड़क का फासला था
ये सड़क के इस पार hospital में अवतरित हुए ,उन्हें देवकी ने उस पार पाला था
ब्रज का होने का इन्हें बहुत बड़ा भोकाल है
कान्हा समझते है अपने को,पर गोपियों का अकाल है
बांसुरी बजाते है ,लोगो को नचाते भी है
खाते खूब है,फिर भांग से पचाते भी है
बचपन इनका कुञ्ज गलियों में बीत गया
विडियो गेम खेलने का time,गीता सार में रीत गया
और अब इस उम्र में video game खेल रहे है
आते जाते हर किसी पर गीता इश्लोक पेल रहे है

खैर वक़्त ने करवट बदली
हो गयी इनके पापा क़ी बदली……To Be continue !!!

abhi aaage bhi hai bhai ……in next sequel u will find how a brij ka gwala converts to a rajasthani bhaya 😀 …..dekhte rahiye,padhte rahiye…….haan hanse rahiye !!!

ये प्यार के अरमां दूर तलक जायेंगे ….

जो तुम कभी ऐसे रूठ जाते हो
दिल से जैसे जान सी लिए जाते हो
दर्द भर जाता है दिल में मेरे
तुम आकर फिर उस पर यूँ मुस्कुराते हो

माना के रूठना,इश्क की ही एक अदा है
बैचेन कर दे महबूब को,वो ये सदा है
पर कभी मुझे कोई इल्ज़ाम तो दे
मैं भी जलूँ विरह में तेरे,वो नाम तो दे

मेरे दिल से तेरी आँखों का रिश्ता इतना गहरा क्यों है
परेशां क्यों दिल ये होता है,जब तू परेशान होती है
न इसे चैन आता है,न वहां वो सोती है
यहाँ ये दिल जलता है,वहां वो क्यों रोती है

रूठने और मनाने में,ये प्यार के पल रूठ जायेंगे
कभी सोचा है पागल,फिर इन्हें कैसे मनाएंगे
मैं जानता हूँ पाक प्यार है तेरा,पर यकीं मुझे पर भी रख इतना
मेरा वादा तुझसे,ये प्यार के अरमां दूर तलक जायेंगे

प्रिय,याद तुम्हारी फिर आई …

तुम प्यारी हो इस जग से ज्यादा
तुमसे प्यारा,सुमुखी प्यार तुम्हारा
इस जन्म की बात नहीं ये सब
ये रिश्ता कुछ सदियों पुराना
बस सोच ये ही,आँख भर आई
प्रिय,याद तुम्हारी फिर आई

याद मुझे है हर वो पल
बीते थे जो साथ तुम्हारे
वक़्त का वो सुनहरा आँचल
जैसे कायनात के सब सुख साथ हमारे
वक़्त ने ली,आज फिर फिर यूँ अंगडाई
प्रिय याद तुम्हारी फिर आई

तेरे बदन की खुशबु यूँ ही
अब तलक मेरे मन में महक रही है
तेरे होठो की नरम छुहन यूँ ही
मेरे तन में यूँ चहक रही है
आज फिर वही हवा,खुशबु तेरी साथ ले आई
प्रिय,याद तुम्हारी फिर आई

याद तुम्हे करता हूँ हर पल
हर पल तुझको ही जीता हूँ
तेरे ख्वाबो में बैठा रहता
तेरे सपनो में ही सोता हूँ
एक नहीं ऐसा वो पल,जब तुझसे हो हुई जुदाई
फिर कैसे कह दूँ प्रिय,याद तुम्हारी फिर आई
फिर कैसे कह दूँ प्रिय,याद तुम्हारी फिर आई…..

Happy New Year

विगत वर्ष देखे मैंने, कुछ सपने कुछ ख्वाब अधूरे
कुछ दिल की पीड़ा देखी,देखे कुछ मुस्कुराते चेहरे
अरमानो के पर भी देखे,मजबूरी के बंधन भी
तम सी गहरी रात भी देखी,देखे कुछ नए सवेरे भी
.
मधु से मधुघट में गिरती मदिरा देखी
साकी के होठो से छूती अधीरा भी देखी
पीने वालो की तडपन देखी,देखी निश्छल छाया
बनके रूपसी ठगने वाली,देखी चंचल माया
.
सूरज का वो तेज भी देखा
चाँद की सुखन शीतलता भी
देखा कल कल गिरता झरनों से जल
फिर नदी बन,बहती निर्मलता भी
.
अनजाने चेहरों के पीछे
जानी पहचानी बातें देखी
फिर कुछ अपनों के मन में
बेगानी होती यादें देखी
.
प्रेयसी का पावन प्यार भी देखा
दर्पण में रच श्रृंगार भी देखा
होठो पे बहती मादकता देखी
नैनो में बसता संसार भी देखा
.
बहुत मिला विगत वर्ष से मुझको
अब आशाओ के कदम नव वर्ष में
रंगों से नहाये ये धरती,जन सब इसके
बीते जीवन,सुखमय अविरत हर्ष में

मुझको ये दर्द भरे जज्बात न दे

मैंने मांगी है होठो पे हंसी तेरी
मुझको अश्को की यूँ सौगात न दे
मेरी ख्वाइश के रहे तू खुश हमेशा
मुझको ये दर्द भरे जज्बात न दे
.
मैं खुश हूँ के गर,तेरी खुशियाँ चेह्के
बनके खुशबु तेरी ये बगिया महके
ख्वाबो में बस जा तू,सदा बनकर
दिल से जाने की यूँ मुझको आहट न दे
.
मैंने की है मोहब्बत सब कुछ भुलाकर तुमसे
सारी कसमें,सारे वादें निभाकर तुमसे
कुछ दूर साथ तो चल,प्यार तो कर
मेरे दर्द-ऐ-दिल को,तेरी ये चाहत न दे ……

नज़रे …


कहते है नज़रे बयां करती है
हाल-ऐ-दिल का फ़साना
खुश हो दिल तो
गाती है जिंदगी का तराना
और दुखी हो मन तो
बहा देती है, दर्द बेगाना

पर उसकी आँखों में
एक अजीब सी ख़ामोशी है
थोडा सा दर्द है, थोड़ी ख़ुशी
थोड़ी सी मदहोशी है
जिंदगी के कुछ कडवे पल है
कुछ बिखरे सपने है
कुछ अधूरी ख्वाहिशे
और कही जैसे जगी सी बेहोशी है

वो जब नज़रे मिलाती है
दिल में गहरे से उतर जाती है
और फिर जैसे बना लेती है नाता
मेरे दिल से, मेरे मन से
मेरी आत्मा से, मेरे तन से

कही ये नज़रे ही तो नहीं
जो दिल में इतना प्यार जगाती है
जो समझ न पाए ये दिमाग
दिल से सब ये बताती है

इसलिए तेरी नजरो का
हर दम इन्तजार रहता है
ये दिल,ये मन
उसकी एक झलक को बेक़रार रहता है

इन आँखों को.
आंसुओ से यूँ न भिगोया कर
बहुत मीठे सपने है इनमें
उन्हें मोतियों की तरह पिरोया कर
फिर देख,जहाँ भर की खुशियाँ
इनमें बस जाएँगी
ये पहले की तरह ही
खिलेंगी,हसेंगी,मुस्कुरायेंगी …..

नज़रे …


कहते है नज़रे बयां करती है
हाल-ऐ-दिल का फ़साना
खुश हो दिल तो
गाती है जिंदगी का तराना
और दुखी हो मन तो
बहा देती है, दर्द बेगाना

पर उसकी आँखों में
एक अजीब सी ख़ामोशी है
थोडा सा दर्द है, थोड़ी ख़ुशी
थोड़ी सी मदहोशी है
जिंदगी के कुछ कडवे पल है
कुछ बिखरे सपने है
कुछ अधूरी ख्वाहिशे
और कही जैसे जगी सी बेहोशी है

वो जब नज़रे मिलाती है
दिल में गहरे से उतर जाती है
और फिर जैसे बना लेती है नाता
मेरे दिल से, मेरे मन से
मेरी आत्मा से, मेरे तन से

कही ये नज़रे ही तो नहीं
जो दिल में इतना प्यार जगाती है
जो समझ न पाए ये दिमाग
दिल से सब ये बताती है

इसलिए तेरी नजरो का
हर दम इन्तजार रहता है
ये दिल,ये मन
उसकी एक झलक को बेक़रार रहता है

इन आँखों को.
आंसुओ से यूँ न भिगोया कर
बहुत मीठे सपने है इनमें
उन्हें मोतियों की तरह पिरोया कर
फिर देख,जहाँ भर की खुशियाँ
इनमें बस जाएँगी
ये पहले की तरह ही
खिलेंगी,हसेंगी,मुस्कुरायेंगी …..

वो मेरे दिल में रहता है ….


ये कैसी बेकरारी है,
वो बस एक चेहरा समझता है
मेरी आँखों में वो
हीरे सा चमकता है
मैं उसके दिल में रहता हूँ
वो मेरे दिल में रहता है

दिनों को चैन नहीं मुझको
ना रातो को नींद आती है
उसकी यादों की तड़पन मुझको
इतना क्यों सताती है
मैं उसकी याद में पिगलता हूँ
वो मेरी याद में जलता है

उसकी आँखों में रोता हूँ
उसके होठो पे हँसता हूँ
खबर उसको नहीं लेकिन
उसके सपनो में सोता हूँ
पर कैसे कहू उससे
उसे मैं कितना प्यार करता हूँ ….

भूख !!!

आज फिर उसी ट्रेफिक सिग्नल पर
जहाँ पर आकर मेरी हर शाम रूकती है
कुछ दो तीन मिनट के लिए ….
और पढ़ा जाती है जाने कितने ही अनजाने पहलू

आज सब कुछ अजीब सा था
भीगा हुआ तन,कान में ईअर-फोन
मन में किसी का ख्याल…..
और तभी किसी ने आकर जैसे मुझे छुआ
नन्ही सी हथेली को आगे बढ़ा,वो बोली –
दो रूपये दे दे भाई,भूख लगी है

उसकी फाक सफ़ेद आँखें
जैसे चुनोती दे रही हो, सपनो को ठहरने की
उन बेजान आँखों में कुछ नहीं था
न कोई रंग,न कोई आस
कुछ था तो वो थी रोटी की भूख
और बारिश में और भी ज्यादा तेज होती पेट की आग

साथ में ख्याल
उस नन्हे से बच्चे का
जिसके शरीर पर कपडे की कुछ कतरने
जैसे शायद बारिश और भूख दोनों से लड़ने की
हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी

ये वही लोग है
जिनकी गाथा राजस्थान की मिटटी आज तलक गाती है
जिनकी सौगंध के किस्से
आज भी दिलो में जोश भर जाते है
जिन्होंने कसमें खायी थी,कभी न घर बनाने की
और न कभी मांग कर खाने की

आन की खातिर
जिन्होंने घास की रोटी तक खायी
वही आज चौराहों पर इज्ज़त बेच
दो जून की रोटी मांगते है

सच है, भूख इतिहास से बड़ी होती है
हर कसम से,हर वक़्त से बड़ी
हर एक एहसास और हर बलिदान से बड़ी होती है……

सर्द हवा का झोंका…..

11सर्द हवा का झोंका आया
साथ पुरानी यादें लाया
जब तेरी गोदी में रख सर
मैं बच्चे से सोया था
तेरे हाथो में हाथ पकड़
याद तुझे मैं कितना रोया था

तेरी आँखों में भी
अश्को की माला बिखरी थी
वो बूँद मेरे चेहरे पर गिर
दिल में कितना गहरा उतरी थी

फिर उस नरम हथेली का स्पर्श
जैसे गम सारे भुला गया
मैं नींद से जागा सदियों का
आँचल में तेरे सुला गया

फिर आँख खुली, और वो वक़्त के मंजर
छीने जिसने जीवन के हर स्वर
खोया हर पल मेरा, हर वो बातें
झूटी सच्ची जाने कितनी फरियादें

पर याद तो तेरी दिल में रहती है
जब सोचूं तेरे बारे में
तो चुपके से वो यूँ कहती है
हूँ साथ तेरे मैं, तेरे अन्दर
फिर क्यों कर तुझको रोना आया
सर्द हवा का झोंका आया …..

अब वीकएंड पर भी नहाने लगा हूं !!!

कहाँ थी कमी, और कहाँ था वक़्त, तेरे आने से पहले
तेरे चक्कर में ऐ जान-ऐ-जाना, अब काम से वक़्त चुराने लगा हूं …

ये कैसा सितम काफिर तेरा मेरे मोबाइल पर
कही बुझ न जाये ये चिराग, अब चार्जर भी साथ लेकर आने लगा हूं

आनी है दिवाली और दिल सफाई शुरू हुयी
मेरे दिल की चली न जाये बत्ती, तुझे दिल में जलाने लगा हूं

तेरे बदन से जो खुशबु महके और शमा रंगीन हो
कुछ तो भला किया तुने सनम,अब डीओडोरेंट के पैसे बचाने लगा हूं

तेरी बातो से फुर्सत कहा और तेरी यादो से वक़्त
जी भर के देखू तुझे,इसलिए अब वीकएंड पर भी नहाने लगा हूं

अब न कहना के बहुत अमीरी है तेरे मिलने में
यहाँ लुट चुका हूं मैं , बस कड़ी कोशिश से गरीबी छुपाने लगा हु

मेरी कविता इतनी फर्जी भी होगी,सोचा न था
देख तेरी मोहब्बत में मैं,क्या क्या क्या क्रेप गाने लगा हूं

ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ


जब से आये हो जिंदगी में मेरे
चमन को बहारो का मतलब याद आया
दिल कहे, जीवन की ये बगिया तेरे नाम कर दूँ
ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ

पूछे है पगली, याद करते हो मुझे
कैसे कहू, हर शब्-ओ-सहर तेरी याद में डूबे है
हर वक़्त जो दिल धडके है तेरी खातिर, उसकी हर शाम तेरे नाम कर दूँ
ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ

हर सुबह का आगाज़ तुम्ही से
हर शाम तेरे नाम से ढले
हर जाम से पहले कहू ‘बिस्मिल्लाह’,हर वो जाम तेरे नाम कर दूँ
ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ

वो रोये है तो बरसे है बादल इधर भी
हँसे है तो खिले है फूल इधर भी
तेरी हर मुस्कराहट पर,ये मेरी जान तेरे नाम कर दूँ
ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ

सन्देश दीक्षित

dharam arth samjhau kya ?

This poem was written on the reaction of a debate “Religion and cast” on one my frnds blog.Few was rigid for their stand that there is no need of religion and caste . I have done everything to make them understand that its necessary for our culture and our social system ,but all wer waste …. so here is something for them

जो रक्त से सना नहीं ,जो रक्त में बहा नहीं
उसे रंगे-खून दिखाऊ क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

जिन्हें न मतलब ध्यान से
न गीता से ,न कुरान से
उसे वेद पुराण पड़ाउ क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

जिसमें भावः न ,न भक्ति है
न सुनने की ही सकती है
उसे मंत्र श्लोक सुनु क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

जो कुतर्को से भरे पड़े
पाश्चात्य में रंगे पड़े
उन्हें तर्क वितर्क बुझाऊ क्या
उसे धरम अर्थ समझाऊ क्या

Ye jaruri to nahi

मेरे हर लब्ज़ शब्दों में बया हो , ये जरुरी तो नही ,
दिल के हर जज्बात आँखों में समां हो , ये जरुरी तो नही ,

मुमंकिन है हर दर्द को दिल में छुपाना भी
हर रिसते ‘अश्क’ से भीगे पलके , ये जरुरी तो नही ,

जिसकी मोहब्बत में ,मैं कुछ भी कर गुजर जाऊंगा 
उसे भी मुझ पर हो इतना यकीं ,ये जरुरी तो नही ,

जिसकी यादो में , मैं रात भर सोया नही शायद
उसके ख्वाबो में भी हो मेरा इन्तजार ,ये जरुरी तो नही,

हर वक्त खायी थी जिसने साथ मरने की कसमें
वो दे जिंदगी में भी साथ , ये जरुरी तो नही …..

kya yahi manuj hai?

107
अधीर अधर पर राम प्रकट है ,
व्यथा विकट या काल निकट है

सबल हाथ ,जग सकल साथ है ,
निर्बल ही को बस जग्गंनाथ है .

जीत का अब उन्माद थका है ,
थके हार कटु स्वाद चखा है .

जब तक था माया का साया ,सहज कभी तू याद न आया ,
पर जब सूर्य ढला और तुम गहराया , ह्रदय ओअत में प्रभु नाम समाया .

भक्ति का संगीत नहीं ये दुह-वक्त की चीत्कार है ,
दे शरण कर दुख हरण ये तट नहीं मंझधार है .

धन जीवन ,मन मोह बंधन ,सखा यही बस यही अनुज है ,
आजीवन संचय में मगन ,छल लोभ स्वार्थ ,क्या यही मनुज है ?

Kaise bhulu

forget
कैसे भूलू , वो नैनो की भाषा ,वो चंचल अभिलाषा
वो तेरा शरमाना,आँखे झुका के यू मुस्काना
फिर कान में आकर धीरे से कहना , की तुम्हे मोहब्बत है
तुम्ही बतलाओ मुझे ….कैसे भूलू

कैसे भूलू ,जब तेरे कदमो की आहट से मेरा दिल दहलता था
तेरी एक नज़र के लीए वो इस तरह मचलता था
हर हवा में तेरी खुशबु ,हर फिजा में तेरे नज़ारे ,शायद वक़्त भी तेरे इशारे पे चलता था
कैसे भूलू उस खुशबु को जो आज भी मेरी सांसो में बसती है
तुम्ही बतलाओ मुझे ….कैसे भूलू

कैसे भूलू बारिस की उन बूंदों को ,जो आज भी तेरे प्यार में भिगोती है
उन फूलो की पंखुडियों को .जो डायरी के पन्ने आज भी सजोती है
कैसे भूलू , तेरे सुर्ख होठो से सने खतो को , जो आज भी तेरे होने की गवाही देते है
इन एहसासों से भरी यादो को कैसे भूलू
तुम्ही बतलाओ मुझे …. कैसे भूलू ..कैसे भूलू

Hindi

Ek din mil gayi wo mujhe
gali ke ek mod par
bhikhre ujle kesh,chehre par jhurriya.
jhuki kamar aur hath mein lathi !!!
punchh hi liya maine……….. kon ho tum
hichkati ,haklati wo boli
beta nahi pahchna mujhe……..
mein hindi hu tumhari ma,
maine sabko apne mein samaya,
par… tumhi ne nahi apnaya mujhe
mein jaha kal thi , aaj wo hai………….
sharm se jhuk gayi meri aankhe,
pata nahi kaha chali gayi meri awaj,
aur jab nazre uthi to samne koi nahi tha,
tha to keval sunya,keval sunya…………..!!!!!

Naya Bharat

independence-day

जून की गर्मी में , सड़क के उस चोराहे पर
नंगे पांव, अधनंगे बदन में
उस बेबस ,लाचार औरत को , क्या तुमने कभी देखा है

वो कभी फूल बेचती ,या गाड़ी पोछती ,
भीख में दिए दो पैसो से सपनो को सेचती,
उसके हाथ में जो बेचने के लिए तिरंगा है ,
क्या उसे , उसका कुछ मोल पता है
वो तो सिर्फ़ जानती है ,की इसे बेचकर वो कुछ पैसे कमाएगी
और अपने कान्हा को , दो वक्त दूध पिलाएगी

और हमारे लिए , हमारे लिए वो तिरंगा ,
10 रुपये में खरीदी हुई एक दया है ,
जो कार के डेस्क बोर्ड पर लहराता रहेगा ,
और किसी पर किए एहसान को दिखता रहेगा

और वो जो दूर उस सड़क के किनारे बेठी है ,
जिसकी आँखों में कुछ लाचारी है , और क्रोध भी है शायद
वो उठ नही सकती ,गर्भवती है शायद ,
लेकिन फ़िर भी वो आज आई है ,
शायद पेट की भूख उसे यहाँ खीच लायी है

लेकिन तभी , तभी वो उठ खड़ी हो जाती है
शायद दर्द अब भूख पर भरी है ,
वो इधर उधर भागती ,
हर आदमी से मदद मांगती
हर गाड़ी को रोकती ,
हर आते जातें को टोकती ,
मगर , ये सब व्यर्थ है ,
क्यूंकि किसी की मदद न करना ही
हमारी मानवता का सही अर्थ है ,
हम तो जानतें है नारी शक्ति पर चिंतन करमा ,
और संसद के बहार खड़े होकर लाठियों से लड़ना

फ़िर भी देव नही कपतें , भूमि भी न रसातल जाती है
आज फ़िर एक यशोदा, कन्हे को सड़क पर ही जन जाती है
आज फ़िर जनम होता है एक नए भारत का ,
एक नई सभ्यता और एक नए ज़माने का !!

Aar Par Ho Jane Do …..

मैंने देखा हैं सागर में भीगे सूरज को नहाते हुए
उसी गुम्बद पर, जहा मेरा घर था ,तारो को बतियातें हुए ,
वहां हवा भी आकर बहुत इठलाती थी
दामन में अपने ,सात समुंदर की खुशबु भर लाती थी ….

वो भारत का ‘ताज ‘ था
कहतें है ,मेरे देश की संस्कृति का आगाज था ,
इस ईमारत को पता था , न हिन्दू का ना मुस्लमान का
न इल्म था ,गीता का ना कुरान का ….

उसके पास ही हम लोगो की सुबह खिलती थी
एक नन्ही सी लड़की ,हाथो में दाने लिए रोज मिलती थी ,
बड़े चेन से हम लोग खुशिया मनाते
जरा सी आहट पर, मीलो दूर उड़ जातें
फिर वही आकर बैठ जातें , उसी लाल गुम्बद पर ….

जहाँ आज सिर्फ बारूदों के निशान सने है
हर दिशा में , सिर्फ और सिर्फ श्मशान बने है ,
आज चीख रही है दीवारे ,कोई उन्हें उनका दोष बता दे
जिस आँगन ने खून पिया ,उसे अपना रोष बता दे ….

क्या इतना ही अपराध ….वो समरस हो अपनाती गयी
मिलता रहा जो राहों में ,सबको गले लगाती गयी ,
आज वही संगीने गाढ़ चुके हैं उसके दामन में
जो खेले, पले- बढे , रहे ,उसके आँगन में …..

आज वही आतंक को ‘जेहाद’ बना कर घूम रहे
भारत माता की छाती पर ‘पाक’ ध्वजा को चूम रहे ,
आज एक बार फिर , ‘कायर’, माँ को ललकार गए है
सयंम के मन के तारो को, फिर एक बार झंकार गए है ….

सयंम बहुत हुआ अर्जुन , अब गांडीव उठा लो
विश्व पटल से ,’आतंकी देश’ का नामोनिशान मिटा दो,
बस एक बार अब , बंद तोपों का मुह खुल जाने दो
जो होगा भाग्य समर्पित , आर पार हो जाने दो …..

Aakhir kab tak ?

आज फिर धमाके हुए , शहर के उस चौराहे पर ,
जहा खिखिलाती हुयी जिंदगी आज भी खड़ी थी ,
किसी बस के इन्तजार में,
और कोई आया था , कुछ खरीदने ,
अपने छोटे से संसार को खुशियों से सीचने I

वो इन्तजार में थी आज अपने इंटरव्यू के लिए ,
मन में आशा थी की आज वो नौकरी पा जायेगी ,
और जो उसकी बूढी माँ , सालो से उसको पाल रही थी ,
उसके दामन में ढेरो खुशिया भर जायेगी I

कुछ बच्चे भी खड़े थे , स्कूल के इन्तजार में ,
जिन्हें बड़े होकर इस देश का भर उठाना था ,
भारत की सभ्यता , संस्कृति को विश्व पटल तक बढ़ाना था I

कुछ ही पलो में मिटा दिया उस आवाज ने ,
उन आँखों के सपनो को , जिन्हें सालो से पाला था किसी ने ,
आज आँखों से सामने अँधेरा है ,
जो कल तक किसी का सहारा थे ,
आज सहारे की तलाश में है I

ये सपने नहीं जानते ,
किसी हिन्दू को न मुस्लमान को ,
न ये जानतें है हिंदुस्तान को , न पाकिस्तान को ,
फिर क्यों उन्हें ही चुकाना पड़ता है हर बार इस क़र्ज़ को ,
क्यों भूल जाते है वो ‘कायर’ मानवता के अपने फ़र्ज़ को ,
क्यों आतंक को हमेशा जेहाद कहा जाता है ,
क्यों धरम को इस तरह नंगा नचाया जाता है I

आखिर कब तक यू मानवता का अंत होता रहेगा ,
आखिर कब तक बूढा बाप ,बेटे के अर्थी ढोता रहेगा ,
आखिर कब तक सुहागन की चूडिया बिखरेंगी ,
आखिर कब तक बच्चों की आहें सिंसेकेंगी ,
कब तक …..
आखिर कब तक …..???

Audio and pdf Of Madhushala

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला’
‘और लिये जा, और पीये जा’, इसी मंत्र का जाप करे’
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला

दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।

नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।

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Aakhir kab tak ?

आज फिर धमाके हुए , शहर के उस चौराहे पर ,
जहा खिखिलाती हुयी जिंदगी आज भी खड़ी थी ,
किसी बस के इन्तजार में,
और कोई आया था , कुछ खरीदने ,
अपने छोटे से संसार को खुशियों से सीचने I

वो इन्तजार में थी आज अपने इंटरव्यू के लिए ,
मन में आशा थी की आज वो नौकरी पा जायेगी ,
और जो उसकी बूढी माँ , सालो से उसको पाल रही थी ,
उसके दामन में ढेरो खुशिया भर जायेगी I

कुछ बच्चे भी खड़े थे , स्कूल के इन्तजार में ,
जिन्हें बड़े होकर इस देश का भर उठाना था ,
भारत की सभ्यता , संस्कृति को विश्व पटल तक बढ़ाना था I

कुछ ही पलो में मिटा दिया उस आवाज ने ,
उन आँखों के सपनो को , जिन्हें सालो से पाला था किसी ने ,
आज आँखों से सामने अँधेरा है ,
जो कल तक किसी का सहारा थे ,
आज सहारे की तलाश में है I

ये सपने नहीं जानते ,
किसी हिन्दू को न मुस्लमान को ,
न ये जानतें है हिंदुस्तान को , न पाकिस्तान को ,
फिर क्यों उन्हें ही चुकाना पड़ता है हर बार इस क़र्ज़ को ,
क्यों भूल जाते है वो ‘कायर’ मानवता के अपने फ़र्ज़ को ,
क्यों आतंक को हमेशा जेहाद कहा जाता है ,
क्यों धरम को इस तरह नंगा नचाया जाता है I

आखिर कब तक यू मानवता का अंत होता रहेगा ,
आखिर कब तक बूढा बाप ,बेटे के अर्थी ढोता रहेगा ,
आखिर कब तक सुहागन की चूडिया बिखरेंगी ,
आखिर कब तक बच्चों की आहें सिंसेकेंगी ,
कब तक …..
आखिर कब तक …..???