कुछ पुरानी है ग़ज़ल …

कुछ पुरानी है ग़ज़ल,कुछ मैं नया नया सा हूँ आशिकी के मर्म का,इक हर्फ़,बयां बयां सा हूँ मुझसे मेरी बेरुखी, का सबब मत पूछिए कुछ तो पी ली है मगर,कुछ मैं गया गया सा हूँ जानता हूँ मैं हकीक़त,दौर-ऐ-दुनिया की मगर कुछ तो मैं खामोश हूँ,कुछ अंदाज़-ऐ-हया सा हूँ उम्मीद मुझसे बेवफाई की, न कर […]

एक तेरे दर्द ने बेहिसाब कर दिया

उम्मीदे बहुत थी इस दुनिया से मगर बेखुदी ने मेरी,मुझे लाजबाब कर दिया गम की निसबत ही कुछ इस कदर थी फिर एक तेरे दर्द ने बेहिसाब कर दिया छुपाते वो रहे, पाक-ऐ-इश्क को जो जलजले ने एक, बे-हिजाब कर दिया सफ़क यूँ था ,लिखने का,सुनाने का वक़्त ने उन्हें ही, कित्ताब कर दिया हर […]

ये कैफियत मेरी

उनके सवाल और ये मशरूफियत मेरी कौन जाने ,क्यों कर है ये कैफियत मेरी अब उन तक नहीं जाती है, यूँ सदा-ऐ-दिल जाने कहाँ वो खुदा और कहाँ इलाहियत मेरी वो रूठे और एक हफ्र भी ना हो होठो पर कभी ऐसी भी ना थी, यूँ बे-तबियत मेरी नहीं आते है मुझे,ये वजा-ऐ-बशर-ऐ-दुनिया कुछ फितरत-ऐ-इश्क […]

Ghalib ki haveli

बल्लीमारान के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियां सामने ताल के नुक्कड़ पर बटेरों के कसीदे गुडगुडाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वह वह चाँद दरवाज़ों पर लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के परदे …. These ultimate lines was written by great poet Gulzar as the introduction of his […]

क्यूँ बुतों को छुपाते हो दोस्तों

काफिरों की बस्ती में,क्यूँ बुतों को छुपाते हो दोस्तों क्यों नकाबपोशो से फिर यूँ,रिश्ते निभाते हो दोस्तों तुम ही तो बेचते हो फसाद-ऐ-मजहब का सामान फिर क्यूँ हिन्दू-ओ-मुसल्मा को भाई बनाते हो दोस्तों बड़े अदब से मिलते हो, आजकल हर इंसा से तुम ये जोहर-ऐ-बेशर्मी-ऐ-गुफ्तार कहाँ से लाते हो दोस्तों एक भी कतरा नहीं,और हज़ारो […]

बात इतनी सी हो

बात इतनी सी हो कि,बस बात हो जाये एक बार फिर उनसे कही, मुलाकात हो जाये . इक उम्र से देखा ही नहीं,सावन मैंने तेरी आँखों से मिलूं,और, बरसात हो जाये . बड़ी मुश्किल से हैं,नूर-ऐ-चारागा रोशन जल जाने दो मुझको कि,न तर्क रात हो जाये . थक गया हूँ मिलकर ,जुदा हो होकर अब के कुछ […]