आज फिर यूँ वो

आज फिर यूँ वो ,दिल को याद आएँ है
बेशाख्ता अश्क़ आँखों से,उतर जाएँ है

मेरी धड़कन में है,तेरी यादों का हिसाब
बेगारी-ऐ-दिल,यूँ ही धडकता जाए है

दीन-ऐ-दिल का ख्याल भी दिल को हो
बेवफाई उसकी हो,जिस से वफ़ा पाए है

मुश्किल भी नहीं है,इश्क की राह ‘शादाब’
गर कदम जो उसके,मेरा साथ निभाए है

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एक तेरे दर्द ने बेहिसाब कर दिया

उम्मीदे बहुत थी इस दुनिया से मगर
बेखुदी ने मेरी,मुझे लाजबाब कर दिया


गम की निसबत ही कुछ इस कदर थी
फिर एक तेरे दर्द ने बेहिसाब कर दिया

छुपाते वो रहे, पाक-ऐ-इश्क को जो
जलजले ने एक, बे-हिजाब कर दिया

सफ़क यूँ था ,लिखने का,सुनाने का
वक़्त ने उन्हें ही, कित्ताब कर दिया

हर मोड़ पर तुम, यूँ मुस्कुराते थे ‘शादाब’
दौर-ऐ-मजाज़ी ने तुम्हे खराब कर दिया

किस पर ऐतबार करूँ

कहाँ ले जाऊं दर्द-ऐ-जिगर को,कहाँ पर करार करूँ
मेरी बस्ती में अदाकार बहुत है,किस पर ऐतबार करूँ

उनकी तस्वीर अब कागजों पर बनाता मिटाता हूँ
मुद्दत हुई वस्ल-ऐ-यार को,कब तलक इंतज़ार करूँ

वो खुश नसीब है जिनकी आँखों में अश्क है अभी
दिल-ऐ-संग से टपके है लहू ,जो तीर आर पार करूँ

ये मोहब्बत और फिर ये ज़माने के लाखो उसूल
मेरा घर न हो गर साथ तो संग मेरी मज़ार करूँ

कब तलक आतिश-ऐ-इश्क जलाया करोगे शादाब
मेरी ख़ामोशी को सुने कोई, तो मैं भी इकरार करूँ