आज फिर यूँ वो

आज फिर यूँ वो ,दिल को याद आएँ है
बेशाख्ता अश्क़ आँखों से,उतर जाएँ है

मेरी धड़कन में है,तेरी यादों का हिसाब
बेगारी-ऐ-दिल,यूँ ही धडकता जाए है

दीन-ऐ-दिल का ख्याल भी दिल को हो
बेवफाई उसकी हो,जिस से वफ़ा पाए है

मुश्किल भी नहीं है,इश्क की राह ‘शादाब’
गर कदम जो उसके,मेरा साथ निभाए है

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कुछ पुरानी है ग़ज़ल …


कुछ पुरानी है ग़ज़ल,कुछ मैं नया नया सा हूँ
आशिकी के मर्म का,इक हर्फ़,बयां बयां सा हूँ

मुझसे मेरी बेरुखी, का सबब मत पूछिए
कुछ तो पी ली है मगर,कुछ मैं गया गया सा हूँ

जानता हूँ मैं हकीक़त,दौर-ऐ-दुनिया की मगर
कुछ तो मैं खामोश हूँ,कुछ अंदाज़-ऐ-हया सा हूँ

उम्मीद मुझसे बेवफाई की, न कर मेरे रकीब
कुछ तो मैं दिल हूँ अगर ,कुछ मैं रया रया सा हूँ

हर्फ़ = word,रया = sincere,रकीब =enemy

एक तेरे दर्द ने बेहिसाब कर दिया

उम्मीदे बहुत थी इस दुनिया से मगर
बेखुदी ने मेरी,मुझे लाजबाब कर दिया


गम की निसबत ही कुछ इस कदर थी
फिर एक तेरे दर्द ने बेहिसाब कर दिया

छुपाते वो रहे, पाक-ऐ-इश्क को जो
जलजले ने एक, बे-हिजाब कर दिया

सफ़क यूँ था ,लिखने का,सुनाने का
वक़्त ने उन्हें ही, कित्ताब कर दिया

हर मोड़ पर तुम, यूँ मुस्कुराते थे ‘शादाब’
दौर-ऐ-मजाज़ी ने तुम्हे खराब कर दिया

ये कैफियत मेरी

उनके सवाल और ये मशरूफियत मेरी
कौन जाने ,क्यों कर है ये कैफियत मेरी

अब उन तक नहीं जाती है, यूँ सदा-ऐ-दिल
जाने कहाँ वो खुदा और कहाँ इलाहियत मेरी

वो रूठे और एक हफ्र भी ना हो होठो पर
कभी ऐसी भी ना थी, यूँ बे-तबियत मेरी

नहीं आते है मुझे,ये वजा-ऐ-बशर-ऐ-दुनिया
कुछ फितरत-ऐ-इश्क है और कुछ तरबियत मेरी

[मशरूफियत = busyness,कैफियत = Circumstance,सदा = voice, इलाहियत = Divinity,तबियत = dispositon,वजा-ऐ-बशर-ऐ-दुनिया=way to live in the world,तरबियत=Edification]

क्यूँ बुतों को छुपाते हो दोस्तों

काफिरों की बस्ती में,क्यूँ बुतों को छुपाते हो दोस्तों
क्यों नकाबपोशो से फिर यूँ,रिश्ते निभाते हो दोस्तों

तुम ही तो बेचते हो फसाद-ऐ-मजहब का सामान
फिर क्यूँ हिन्दू-ओ-मुसल्मा को भाई बनाते हो दोस्तों

बड़े अदब से मिलते हो, आजकल हर इंसा से तुम
ये जोहर-ऐ-बेशर्मी-ऐ-गुफ्तार कहाँ से लाते हो दोस्तों

एक भी कतरा नहीं,और हज़ारो खूं है सर पर
ये पाक-ऐ-दामन कहाँ से सिलाते हो दोस्तों

बात इतनी सी हो

बात इतनी सी हो कि,बस बात हो जाये
एक बार फिर उनसे कही, मुलाकात हो जाये
.
इक उम्र से देखा ही नहीं,सावन मैंने
तेरी आँखों से मिलूं,और, बरसात हो जाये
.
बड़ी मुश्किल से हैं,नूर-ऐ-चारागा रोशन
जल जाने दो मुझको कि,न तर्क रात हो जाये
.
थक गया हूँ मिलकर ,जुदा हो होकर
अब के कुछ ऐसे मिलूं ,कि कायनात हो जाये

इश्क को इख्तियार ना था

तुमको जो मेरे वादे पर ऐतबार ना था
वो कुछ और ही था,फ़क़त प्यार ना था

आज भी यूँ गुज़रे है,यादों में राते मेरी
गर क्या जो मैं, तेरी महफ़िल में शुमार ना था

क्यूँ कर के हुए इस अहद-ऐ-दुनिया में बदनाम
होश में हम ना थे,इश्क को इख्तियार ना था

अब क्यों देखते हो आसमां के जानिब. फरिस्तो
वो खाक ना थी,उश्शाक का गुबार ना था

हम तो यूँ ही चलते रहे उन्ही मंजिलो की ओर
रहगुज़र पर हमारा,किसी को इंतज़ार ना था

हम बेवफा ही सही

उन्हें जो इतना यकीं,हम बेवफा ही सही
मेरे दिल में रहते है,फखत खफा ही सही

उनकी नजरो में है,अब तलक वो जादू
मेरी रूह को उसके बदन की सजा ही सही

साकी को भी है सफ़क, मेरे मैखाने का
मय मय ना सही,मेरे दिल की दवा ही सही

हमने ताउम्र की है,इबादत जिसकी
तेरी नजरो में,मोहब्बत जफा ही सही

तुम इन हुस्न वालो को ना समझ पाए ‘शादाब’
ऐ इलाही, क़त्ल करना इनकी अदा ही सही

मनाने का तजुर्बा कुछ और तो हो


बेकरारी मेरे दिल को कुछ और तो हो
बेशुमारी-ऐ-मोहब्बत कुछ और तो हो

तुम आफताफ ही सही,चर्ख-ऐ-मकौकब के
इस ज़र्रे पर तेरा नूर कुछ और तो हो
[आफ़ताब = Sun]
[चर्ख-ऐ-मकौकब = Sky full with stars]

हमें भी आता है तुफानो में कश्ती का सफ़र
दरिया में ज़लज़ला अभी कुछ और तो हो

तुझ तक भी जा पहुचेगी नमी मेरी
अश्कबारी का सबब कुछ और तो हो

उन्हें रूठने का हुनर खूब आता है “शादाब”
हमें मनाने का तजुर्बा कुछ और तो हो

कुछ दूर महखाने से गुज़र कर देखते है

छोड़कर खुदा-परस्ती,बेवफा होकर देखतें है
चलो,कुछ दूर महखाने से गुज़र कर देखते है

सुना है दीवाने बहुत है,हुस्न के उनके
हम भी आज,सज संवर कर देखते है

उन्हें मनाने चाँद तारें,जमीं पर उतरते है
चलो हम भी थोडा आज, रूठकर देखते है

सब-ओ-रोज़ लगाते है वो इलज़ाम हम पर
आज हम उन पर इलज़ाम धर कर देखते है

उनकी नज़रे ही,सब कुछ कह जातीं है ‘शादाब’
आज उनकी नजरो से,बात कर के देखते है

किस पर ऐतबार करूँ

कहाँ ले जाऊं दर्द-ऐ-जिगर को,कहाँ पर करार करूँ
मेरी बस्ती में अदाकार बहुत है,किस पर ऐतबार करूँ

उनकी तस्वीर अब कागजों पर बनाता मिटाता हूँ
मुद्दत हुई वस्ल-ऐ-यार को,कब तलक इंतज़ार करूँ

वो खुश नसीब है जिनकी आँखों में अश्क है अभी
दिल-ऐ-संग से टपके है लहू ,जो तीर आर पार करूँ

ये मोहब्बत और फिर ये ज़माने के लाखो उसूल
मेरा घर न हो गर साथ तो संग मेरी मज़ार करूँ

कब तलक आतिश-ऐ-इश्क जलाया करोगे शादाब
मेरी ख़ामोशी को सुने कोई, तो मैं भी इकरार करूँ

मुझे इस प्यार से अदावत बहुत है

जाने कब तक हो मौत का इंतज़ार
जिंदगी से मुझे शिकायत बहुत है

मुझसे नफरत ही करो दुनियावालो
मुझे इस प्यार से अदावत बहुत है

न हँस के मिला करो रहगुज़र मेरे
मुझे अब अश्को की आदत बहुत है

संग किसी के अब न चल पाउँगा कभी
हर राह को मुझसे खिलाफत बहुत है

आज वो ही हैं रुसवा, तुमसे ‘शादाब’
जो कहते थे, के तुमसे मोहब्बत बहुत है

हम उन्हें याद नहीं करते !!!


उन्हें शिकायत के, हम उन्हें याद नहीं करते
चलो गर ये सच है तो हम फ़रियाद नहीं करते
.
उन्हें हमारी मोहब्बत पर,इतना यकीं है फिर भी
पूछे है हमसे,दिल पे अपने एतिकाद नहीं करते
.
आगाह थे हम के कत्ल होगा,दीदा-ऐ-हुस्न से
गुल-ऐ-आसिर हुए,ये तदबीर सैयाद नहीं करते
.
वो कहते है के कुछ अलग से हो अरसे से
मोहब्बत पे नहीं लिखते,कोई फसाद नहीं करते
.
पाक-ऐ-इश्क है और बेशुमार मोहब्बत भी
इबादत न करू,ऐसा तो नामुराद नहीं करते
.
उनके ख्यालो में,हम उलझे रहते है  ‘शादाब’
इसी मशरूफियत में, हम उन्हें याद नहीं करते

उल्फत-ऐ-यार लिख जाऊं किस तरह

हूँ चुप अरसे से,ये कहानी सुनाऊं किस तरह
जो दिल में लगी है आग,बुझाऊं किस तरह

ना पूछ काफिर, क्या पाया,खोया इश्क में मैंने
दिल का दर्द है नासूर ,लफ्जों पर लाऊं किस तरह

मेरे सीने में लहू-ऐ-इश्क बहता है अब तलक
उस बेवफा-ऐ-हुस्न को, दीदार कराऊँ किस तरह

लोग कहते है के मेरे आगोश में अँधेरा है
आतिश-ऐ-मोहब्बत, दिखाऊं किस तरह

वो आगाज़ को अंजाम समझे है अभी तक
ये दरिया-ऐ-इश्क है,उन्हें समझाऊं किस तरह

जिस कलम से कभी,हाल-ऐ-दिल लिखा था ‘शादाब’
फिर उसी से,उल्फत-ऐ-यार लिख जाऊं किस तरह

एक मदहोशी है …

तेरी आँखों से जो ये अश्क गिरते है
मेरे सीने में वो,गहरे से उतरते हैं

एक मदहोशी है, उनके प्यार में ऐ-दिल
मेरी बगिया में आके,वो यूँ महकते है

हम तो इश्क में डूबे है,मजनू की तरह
ये नादान लोग,हमें पागल समझते है

मैं कही उनको भूल ना जाऊ कभी
इसलिए वो, मेरे दिल में धड़कते है

ना जाने कौनसा रिश्ता है, तुझसे मेरा
यूँ ही नहीं,तेरे दर्द, मेरे सीने में पिगलते है

मेरी आँखों में आकर अश्क भरे कोई….

वो दें कुछ जज्बात तो, ग़ज़ल करे कोई
मेरी आँखों में आकर, अश्क भरे कोई

कब तक छुप छुप कर मिलोगे यूँ ही
बैखोफ इश्क है,क्यूँ ज़माने से डरे कोई

वो जो देखे है तो, नज़र जिगर तक उतरे
फिर उन मतवारी आँखों पे,क्यूँ न मरे कोई

मोहब्बत ने कुछ इस कदर सिखाया हमको
जैसे डूब दरिया में,सागर से तरे कोई

अब रोको मत,सज लेने दो मुझको ‘शादाब’
नर्गिस-ऐ-बीमार है,फिर क्यूँ न संवरे कोई

महबूब नज़र आता है..


प्यार में कहा कभी, किसी को मिली है मंजिले
परवाने का मुक्कदर है, शमा में जल जाने को

आईने में देखू अगर, तो महबूब नज़र आता है
इश्क कहते है शायद,दो जिस्म के मिल जाने को

नजरो से नज़र मिले,तो मचल जाता है दिल
वरना कौन पीता है शराब, सम्हल जाने को

ऐ खुदा, अब ना यूँ मंजिल मुझे मिले कभी
बड़ी मिन्नत से माना है वो, साथ चल जाने को

ये चिलमन की खुमारी है या नजाकत महबूब की
घूँघट में यूँ बेक़रार है आफ़ताब, निकल जाने को

अब के सावन जाने क्या बीतेगी तुम पर शादाब
ढेरो अरमान भरे है सीने में, पिघल जाने को

मोहब्बत दिल से जलाने दो …

प्यार के गीत गुनगुनाने दो
अब महफ़िल-ए-शमा बुझाने दो

ख्वाब आते नहीं मगर मुझको
नैन भर यूँ सपने दिखाने दो

बरस हुए, याद में तेरी शायद
आज रात बन के सुलाने दो

आग में जल इश्क किया हमने
मोहब्बत दिल से जलाने दो

जो किये वादे प्यार में तुम से
जान दे कर,मुझे निभाने दो

PS – इस ग़ज़ल की बह्र है बह्रे-खफीफ मुसद्दस् मख्बून मक्तुअ जिसके अरकान हैं फ़ायलुन् फ़ायलुन् मफ़ाईलुन् या 212 212 1222

अश्को की जो बात हुई

ये खेल नसीबो का ,तुझसे जो मुलाकात हुई
शब ने की साजिश ,जो ये हसीन रात हुई

यूँ ही फिर रहा था,सेहरा में मैं अकेला
खुदा की मेहर,तेरे इश्क की बरसात हुई

ना तुमने कुछ कहा,न जुम्बिश मेरे लबो की
वो मिलन रूह का था,अश्को की जो बात हुई

तेरे हुस्न का जादू है या,कसूर मेरे नैनो का
मेरा दिल मेरे पास नहीं,जिंदगी खैरात हुई

अब न जी पाएंगे हिज्र में तेरे ‘शादाब’
धडकनों को गिनने की अब शुरुआत हुई

कोई दीवाना याद आता है ….

आज भी तेरा यूँ नज़रे झुका के, शर्मना याद आता है
यादो में समां के, दिल में उतर जाना याद आता है

बहुत बरसते है बादल,टकराती है घटाए भी पर
मेरे चेहरे पे तेरा यूँ ,जुल्फ गिराना याद आता है

आकर मेरे करीब चुपके से मुस्कुरा जाना तेरा
फिर अपने पल्लू से आंसू छुपाना याद आता है

मुश्किलें थी मिलन में और संग दिल था जमाना
पर ऐसे में भी तेरा वादा निभाना याद आता है

हमने तो सब कुछ फ़ना किया इश्क में ‘शादाब’
क्या तुझको भी ऐसा कोई दीवाना याद आता है

Mehdi Hassan Hospitalized In Karachi

Its not more than two years since I am in love with indian classical music,but its enough time to develop good ears.My favourite rag is “Rag Darbari” and I enjoy it every time when I listen any song in it.the gazal I like most in it is “Hungama kyu hai barpa”….Anyways.I am not here to tell you people that what I like and what I dont… :P,its a long list baby !!! see……I forgot what I want to tell……hmmm, ye!!! it was the rag ‘Sehara’…the most dangerous and rare rag in the Indian claasic music history…dangerous because it used to sing at the of funerals and impossible because its an bad Bad Omen.So,nobody wants to sing and nobody wants to listen but the reason what I see is that, there are many off-tune notes,which is not present in piano and harmoniums.Rag Sehara named ater the word “sehar”,which means desert.It resemble the lonliness of a person….Mehdi hasan sahib has tried this Rag in one of the Eden’s gazal…I am sharing it here… enjoy it !!!

तू गर हमसफ़र भी होता तो क्या होता

आतिश-ऐ-इश्क में जलना था मुझे अकेला,तू गर साथ भी होता तो क्या होता
जब मरना ही था मुझे प्यासा, तो तू समुंदर भी होता तो क्या होता

दिल से निकले पाक-ऐ-अश्क को भी तुने जो बहाना माना
यकीं तुझे मुझ पर इतना तो फिर वो लहू भी होता तो क्या होता

मर तो यूँ भी रहा हूँ काफिर तेरे हाथो से में
तू महबूब न हो,दम-साज़ भी होता तो क्या होता
[दम-साज़ = जल्लाद]

हम तो चले फ़क़त उन रास्तो पर जिनकी कोई मंजिले न थी
किस्मत में था अकेला चलना,तू गर हमसफ़र भी होता तो क्या होता

बहुत निकला इस दिल से प्यार,पर खुद से हारे है ‘शादाब’
ये दिल अगर दिल न हो पत्थर भी होता तो क्या होता

एक इलज़ाम और सही

यूँ तो चाँद में इतने दाग है,फिर एक दाग और सही
खूब लगे इलज़ाम इश्क पर मेरे ,फिर एक इलज़ाम और सही

हर जाम का हर याद से हिसाब लूँ,हर अश्क का हर शाम से
तेरी याद गर ये शराब भुलाये,तो फिर एक जाम और सही

हर साँस पे तेरा नाम लिखा,जिंदगी तुझ पर फ़ना हुयी
खून-ऐ-जिगर जो झूठ है,तो ले मौत तेरे नाम और सही

सख्ती-कशाब-ऐ-इश्क से तुम खूब लड़े हो ‘शादाब’
अब जो जिस्त दुश्मन हुई,फिर एक इंतकाम और सही

आखिरी सांस तेरे करार में

ना देना मेरे ख़त का जवाब, काफ़िर थोड़ी देर और तू,
कैसे कहूँ के कितना मज़ा हैं कासिद के इन्तजार में …

ना दिखा चाँद सा मुखड़ा,यू घूंघट की आड़ में
मेरे नैनो में जो बसी है सूरत,बड़ी बेकरारी है उसके प्यार में

ना मिल हर पल मुझसे यूँ,कभी तो जुदा भी हो
कह उस खुदा से तेरे,के चिनवा दे मुझे किसी मेहराब में

ना छू मुझको,तेरे सुर्ख होठो की लाली से
रहने दे कुछ वक़्त और मुझे, तेरी आहो के शरार में

ना जता हर पल प्यार मुझसे,ना मोहब्बत की यूँ सदा दे
मुझे भी तड़प उस आग की,के जलूं मैं भी तेरे इनकार में

मौत मेरी जिंदगी से हसीन हो,इतना सा ख्वाब है ‘शादाब’
दम निकले आगोश में तेरे,आखिरी सांस तेरे करार में

सर्द हवा का झोंका…..

11सर्द हवा का झोंका आया
साथ पुरानी यादें लाया
जब तेरी गोदी में रख सर
मैं बच्चे से सोया था
तेरे हाथो में हाथ पकड़
याद तुझे मैं कितना रोया था

तेरी आँखों में भी
अश्को की माला बिखरी थी
वो बूँद मेरे चेहरे पर गिर
दिल में कितना गहरा उतरी थी

फिर उस नरम हथेली का स्पर्श
जैसे गम सारे भुला गया
मैं नींद से जागा सदियों का
आँचल में तेरे सुला गया

फिर आँख खुली, और वो वक़्त के मंजर
छीने जिसने जीवन के हर स्वर
खोया हर पल मेरा, हर वो बातें
झूटी सच्ची जाने कितनी फरियादें

पर याद तो तेरी दिल में रहती है
जब सोचूं तेरे बारे में
तो चुपके से वो यूँ कहती है
हूँ साथ तेरे मैं, तेरे अन्दर
फिर क्यों कर तुझको रोना आया
सर्द हवा का झोंका आया …..

याद आने का सबब याद नहीं आता

कैसे कहू के तू अब या तब याद नहीं आता
याद तो आती है मगर,याद आने का सबब याद नहीं आता

किस हुनर से लूट लिया तनहा दिल को तुमने मेरे
वो चोरी तो याद है मगर,वो वक़्त याद नहीं आता

क्यों कर है इतनी मोहब्बत मुझको तुमसे
कोई राज कोई फ़साना याद नहीं आता

जब से आये हो जिंदगी में मेरे
कोई चारागर,कोई नासेह नज़र नहीं आता

क्यों कर पूछे है जमाना ‘शादाब’ तुझसे
जब वो जाने है के,तुझे कोई बहाना याद नहीं आता

उसकी आँखें सवालो जैसी

ढूंढता हूँ हर चेहरे में,चेहरा उसका
वो ख्वाबो में भी लगे है,ख्यालो जैसी

मेरे हर लफ्ज़ समझे है,लब पे आने से पहले
फिर क्यों है उसकी आँखें सवालो जैसी

लबों ने ऐसा जादू किया काफिर तेरे
जगे में भी रहे मेरी सूरत,सोनेवालो जैसी

भूल गया ये जहां,उलझ कर जुल्फों में तेरी
खुदा न बना पाया,कडिया तेरे बालो जैसी

कितनी तारीफ तेरे हुस्न की करे ‘शादाब’
वो दैर में बैठा ,हालत पीनेवालो जैसी !!!

कहो के इन्ताह है !!

इश्क में आशिक महबूब बन जाये,तो कहो के इन्ताह है
मोहब्बत आँखों से झलक जाये, तो कहो के इन्ताह है
वस्ल की सदिया, लम्हों में गुज़र जाये, तो कहो के इन्ताह है
हर वक़्त उसकी साँसों को जीने का जी चाहे, तो कहो के इन्ताह है
क्या लिखे ‘शादाब’ इन्ताह-ऐ-इश्क पर ग़ज़ल
गर लफ्ज़ ही न मिल पाए तो कहो के इन्ताह है …

कैसे कहूँ के कितनी मोहब्बत है

Love45454
कैसे नुमाया करूँ मेरे दिल के ये जज्बात
वो लफ्ज़ ही न बना पाया,जुबान बनाने वाला
[जुबान=language]

कैसे कहूँ के कितनी मोहब्बत है मुझको तुमसे
बस जानता हूँ के मुद्दतो में मिलता है, इतना चाहने वाला

पूछे है वो,इश्क की वजह रोज मुझसे दो चार
काफिर !! आज भी समझे है मेरा प्यार, वो ज़माने वाला

पास हूँ तो बीते है सदिया, लम्हों में मेरी
काश मिल जाये मुझको वो गुर, वक़्त चुराने वाला

मुस्कुराया तो बहुत मेरा सनम, ज़माने भर में
भाये है उसका मुझे हसीं अंदाज, वो रुलाने वाला

क्यों परेशां है ‘शादाब’, वस्ल की खातिर
तू खुदा तो नहीं,अहले-मुहब्बत को मिलाने वाला
[वस्ल=meeting,अहले-मुहब्बत=lover]

लफ्जों में बयां करूँ कैसे

.
वो पूछे है,के याद करते हो मुझे
काफिर!!सोज़-ऐ-दिल,लफ्जों में बयां करूँ कैसे
[सोज़=pain]

वो देखे है,अक्स-ऐ-खुदा मुझमें,मैं उनमें
पिजीराफ्ता-ऐ-मोहब्बत जबां करूँ कैसे
[पिजीराफ्ता – accepted]

वो रोये है वहा,शररबार इधर बरसे
उसके हर इक गिरिया का हक़ अदा करूँ कैसे
[शररबार =raining sparks of fire,गिरिया=tear]

ये माना के ना वस्ल-ऐ-यार होगा कभी
पर इस दिल को तेरे दिल से जुदा करूँ कैसे
[वस्ल=meeting]

— सन्देश दिक्षित

मुझे कल पर मेरे ऐतबार है कोई ?

.
ये मसरूफियत है या नावाकिफ तेरे
पर जो भी है दिल-ऐ-फुगाँ है कोई ?
[मसरूफियत=busy,नावाकिफ=not aware,फुगाँ=spear]

ये इज़्तराब है गुफ्तगू का मेरे
वो काफिर समझे है,या तगाफुल है कोई ?
[इज़्तराब=restlessness,गुफ्तगू=talk,तगाफुल=ignorance]

बहुत उस्तवार है ज़िस्त-ऐ-तुलानी में अपने
मुझे कल पर मेरे ऐतबार है कोई ?
[उस्तवार=proud,ज़िस्त-ऐ-तुलानी=length of life]

कब पिगलेगा बुत,दिल-ऐ-जज़्बात पे मेरे
वो दिल है,या संग-ओ-खिस्त है कोई ?
[संग-ओ-खिस्त=brick of stone]

— सन्देश दिक्षित

PS – For hindi version of this nazm click here

शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक

आह को चाहिए इक ‘उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक ?

दाम हर मौज में है हल्का-ऐ-साद_काम-ऐ नहंग
देखें क्या गुज़रे है कतरे पे गुहर होने तक
[ दाम = net/trap, mauj = wav-e, हल्का = ring/circle, साद = hundred,
नहंग = crocadile, साद_काम-ऐ नहंग = crocadile with a hundred jaws, गुहर = pearl ]

आशिकी सब्र तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करुँ खून-ऐ-जिगर होने तक ?
[ सब्र = patience, तलब = search ]

हम ने माना के तग़ःअफ़ुल न करोगे , लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक
[ तग़ःअफ़ुल = neglect/ignore ]

परतव-ऐ-खुर से है शबनम को फना की तालीम
मैं भी हूँ इक इनायत की नज़र होने तक
[परतव-ऐ-खुर = sun’s reflection/light/image, शबनम = dew,
फना = mortality, इनायत = favour ]

यक_नज़र बेश नहीं फुर्सत-ऐ-हस्ती ग़ःआफ़िल
गर्मी-ऐ-बज्म है इक रक्स-ऐ-शरार होने तक
[ बेश = too much/lots, फुर्सत-ऐ-हस्ती = duration of life,
ग़ःआफ़िल = careless, रक्स = dance, शरार = flash/fire ]

ग़म-ऐ-हस्ती का ‘असद’ किससे हो जुज़ मर्ग इलाज़
शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक
[ हस्ती = life/existence, जुज़ = other than, मर्ग = death, सहर = morning ]

मेरी जान को करार नहीं है

आ,की मेरी जान को करार नहीं है
ताक़त-ऐ-बदाद-ऐ-इंतज़ार नहीं है
[ करार = rest/repose, बेदाद = injustice ]

देते हैं जन्नत हयात-ऐ-दहर के बदले
नशा बा-अंदाजा-ऐ-खुम्मार नहीं है
[ हयात = life, दहर = world, बा-अंदाजा = according to,खुमार = intoxication ]

गिरिया निकाले है तेरी बज्म से मुझ को
हाय ! की रोने पे इख्तियार नहीं है
[ गिरिया = weeping, इख्तियार = control ]

हमसे ‘अबस है गुमान-ऐ-रंजिश-ऐ-खातिर
ख़ाक में उश्शाक की गुबार नहीं है
[ ‘अबस = indifferent, गुमान = suspicion, रंजिश = unpleasantness,ख़ाक = ashes/dust, उश्शाक = lovers, गुबार = clouds of dust ]

दिल से उठा लुत्फ़-ऐ-जलवा हाय मायने
घिर-ऐ-गुल आइना-ऐ-बहार नहीं है
[ मायने = meanings, घिर-ऐ-गुल = blossoms ]

क़त्ल का मेरे किया है ‘अहद तो बारे
वाए ! आखर ‘अहद उस्तुवार नहीं है
[ ‘अहद = promise, बारे at last, उस्तुवार = frim/determined ]

तूने क़सम मयकशी की खाई है ‘ग़ालिब’
तेरी क़सम का कुछ ‘ऐतबार नहीं है !
[ मयकशी = boozing, ऐतबार = trust/faith ]

दीया है दिल अगर उसको ,बशर है क्या कहिये …

I was searching for gazal on the web ………..but most of the I found in the hinglish, Its odd to read urdu in english font .So,I just started rewrite them in their original font,as I think its help me and may be for others also to learn urdu easily ………..I am also including the meanings of some tough words ……… Lets enjoy first gazal on my blog ……….. please do keep writing comments ….

दीया है दिल अगर उसको ,बशर है क्या कहिये
हुआ रकीब तो हो ,नामाबर है ,क्या कहिये
[बशर=आदमी ,रकीब=प्रतिस्पर्धी ,नामाबर = संदेशवाहक ]

ये जिद की आज न आये ,और आये बिन न रहे
कज़ा से शिकवा हमें किस कदर है क्या कहिये
[कज़ा =भाग्य , शिकवा =शिकायत ]

रहे है यो गह-ओ-बे-गह की कू-ए-दोस्त को अब
अगर न कहिये दुश्मन का घर है ,क्या कहिये
[गह=समय ,कू-ऐ-दोस्त = दोस्त की गली ]

ज़ह-ऐ-करिश्मा की यों ,दे रखा है हमको फरेब
की बिन कहे उन्हे सब खबर है ,क्या कहिये
[ज़ह=बचपन ,फरेब=दोखा ]

समझ के करते है बाज़ार मैं वो पुर्सिश-ऐ-हाल
के यह कहे की सर-ऐ-रहगुज़र है ,क्या कहिये
[पुर्सिश=जानकारी,सर-ऐ-रहगुज़र=सड़क पर ]

तुम्हें नहीं है सर-ऐ-रिश्ता-ऐ-वफ़ा का ख्याल
हमारे हाथ में कुछ नहीं है ,मगर है क्या ,कहिये

उन्हें सवाल पे ज़ोअम-ऐ-जूनून है ,क्यों लड़िये
हमें ज़वाब से कता-ऐ-नज़र है ,क्या कहिये
[ज़ोअम=गर्व,कता-ऐ-नज़र है=नज़र अंदाज़ ]

हसद सजा-ऐ-कमाल-ऐ-सुकून है,क्या कीजे
सितम,बहा-ऐ-मता-हुनर है ,क्या कहिये
[हसद=दुश्मन,बहा=कीमत,मता=कीमती ]

कहा है किसने की ‘ग़ालिब’ बुरा नहीं लेकिन
सिवाय इसके की आशुफ्ता-सर है ,क्या कहिये
[आशुफ्ता-सर= दिमागी बीमार ]

— ग़ालिब